ताटक छंद
जो दिखता है ओ बिकता है।देखो आज जमाने में।
उम्र खपा दी सारी अपनी,मान जरा सा पाने में।
लिखना पढ़ना सब सिखलाया,जिसको कुछ ना आता था।
जो इसकुल आने में पहले,देख हमे घबराता था।
सालों बीतें जिन बच्चों को,अंक ज्ञान समझाने में।
वही आज बतलाते हमको,खामी बहुत पढ़ाने में।
जैसे नींव दिखे ना कुछ भी,कैसे कर निर्माण किए।
मान महल पाता है जादा,जिसने सुंदर रूप दिए।
नींव बनाया किसने कैसा,भारी महल टिकाने में।
उसको कोई पूछ रहा ना,देखो आज जमाने में।
दोस दिया करते हैं हमको,क्या हमने सिखलाया है।
ज्ञान मिला है जो बच्चों को ,ओ उनसे हीं पाया है।
बच्चे भी उनको सहराते,दिखता वही जमाने में।
उम्र खपा दी सारी अपनी,मान जरा सा पाने में।
अपना काम करेंगे हम तो,जो कर्तब्य हमारा है।
मान मिले ना फिर भी शिक्षक,कभी कहाँ ओ हारा है।
अनगढ़ को गढ़ कर दिखलाना,मुश्किल रहा जमाने में।
पर हम तो कर के दिखलाते,सहज रहे जस खाने में।
दिलीप कुमार वर्मा
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