Friday, 28 February 2020

दोहा

पद 

पद के पावत ले सबो, गरुवा कस बन जाय। 
कतको ताना मार ले, मुड़ नइ तनिक हिलाय। 

जोरे रहिथे हाथ ला, पाँव परे हरबार। 
मीठ मीठ हरदम कहे, देवय पाँव पखार। 

बपुरा कस सूरत दिखे, लागत हे लाचार। 
एक वोट ला पाय बर, आवय बारम बार। 

लालच के पुड़िया धरे, रतिहा कुन घर आय। 
दाई माई बोल के, चुपके से दे जाय। 

कसम तको खावत रथे, करिहँव पूरा काम।  
निसदिन सेवा मा रहूँ, करँव नही आराम। 

पानी बिजली अउ सड़क, तुरते दँव निरमाय। 
रोटी कपड़ा अउ भवन, सबके सबझन पाय। 

साँच साँच काहत हवँव, मानव कहना मोर। 
फर फर जम्मो हे तुँहर, देहू मोला झोर। 

मीठ मीठ सब बोल के, हम ला रथे फँसाय। 
जीत जथे इक बार जे, तहाँ दरस नइ आय। 

सिंग हलावत मारथे, गरुवा बनथें शेर। 
जूँ नइ रेंगय कान मा, कतको दे तँय टेर। 

जइसे चतुरा कोलिहा, तइसे येखर काम। 
गिरगिट कस बदलत रथे, पल पल माँगय दाम। 

बार बार जाबे कहूँ, देथे ओ गुर्राय। 
मुँह अउ नाक सिकोड़थे, थोरिक ओ नइ भाय। 

धुर्रा मा रेंगय नही, मखमल टाट बिछाय। 
कीरा लागन हम सबो, ओ राजा बन जाय। 

पाँव पखारय जे कभू, घर घर बासी खाय। 
आज उही के पाँव हर, धरती मा नइ आय। 

कलजुग के राजा बने, धरे कभू नइ धीर। 
मास रहे नइ तन तनिक, थामत हे समसीर। 

अइसन राजा के प्रजा, लोहा चना चबाय। 
दूध मलाई छोंड़ के, सुक्खा रोटी खाय। 

दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार

Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल
2122 2122 212

देश के रक्षा करे बर जे लड़े।
ते सिपाही हिन्द मा सबले बड़े।

कोन दुश्मन आ सके घर मा हमर।
वीर सैनिक देश के सीमा खड़े।

पाक आइस हाथ धर आतंक के।
गाल मा तेकर तमाचा हम जड़े।

जेन के नीयत म कोनो खोट हे।
मान ले ओ हिन्द के धरती गड़े।

चीन तक सोंचे कदम रखहूँ इहाँ।
भाग जाथे देख के ओ बिन लड़े।

आज हमरो देश के बड़ नाम हे।
जानथे ताकत हमर सबले बड़े।

हे तिरंगा के कसम तोला दिलीप।
आन के रक्षा करे हरपल अड़े।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल 
2122   2122   2122

जो हमारे चित्त में चिंता है घरता।
ओ हमारे चित्त में अवसाद भरता।

चित्त में चिंता कभी ना पालना तू।
ये सदा ही देह को नुकसान करता। 

सोंचना तो ठीक है पर ध्यान रखना।
सोंच ज्यादा भी हमारे कान भरता।

जो कहे बिन सोंच के ओ भी फसे हैं।
बाद में ओ बोलने से रोज डरता।

मानता हूँ सोंच से हल हो सका है।
सच बताओ सोंच के है कौन मरता।

सोचने से ब्रेन भी लाता कयामत।
काम आये देश के तो ना अखरता।

सोंच कर देखो कहाँ तक सोंचते हो।
ये दिलीप के दुःख को भी मौन हरता। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

जब अति हो जाय कोनो बात जी।
तब समझलव मार देथे लात जी।

बड़ सुहाथे जब गिरे पानी सखा।
पर डरा देथे बढ़े बरसात जी।

घाम हाड़ा बर बने होथे कहे।
पर जला देथे बढ़े जे तात जी।

साँझ कन निकले सबो घूमत रहे।
पर डरा देथे ओ घपटे रात जी।

चाहथे सबझन गुलाबी जाड़ ला।
पर सहे नइ जाय ठंडा घात जी।

साँस बर सब ला हवा चाही इहाँ।
जे बने तूफान बिगड़े बात जी।

आग बिन खाना बने नइ मानथौं।
पर बढ़े जे आग देथे मात जी।

चाहथे पानी रहय नदिया सबो।
बाढ़ दिखलाथे हमर अवकात जी।

हे गरीबी सोंच झन जादा दिलीप
छटपटावत हे अमीरी रात जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

मोर घर ला देख के घबरा जथे।
कोन कहिथे सुख सबो घर आ जथे।

बाँस बल्ली मा टिके छान्ही हवय।
जब कभू आथे हवा उड़िया जथे।

जब बरसथे बून्द पानी के इहाँ।
खाट तक डोंगा बने उफला जथे।

जाड़ मा जस देंह ठिठुरे कटकटा।
मोर घर दीवार हर थर्रा जथे।

घाम बर छइहाँ बने सबके महल।
मोर घर भितरी सुरुज हर आ जथे।

चेरका हन दे हवय दीवाल हा।
देश के नक्शा बने मन भा जथे।

खाय खातिर तोर घर होही सबो।
मोर घर पसिया तको सरमा जथे।

डेहरी ले जे भगाये हव अपन।
मूँड़ बर सब छाँव इहँचे पा जथे।

का मिले कखरो करा रो के दिलीप।
मौत सब ला एक दिन तो खा जथे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

दोस्तो से दोस्ती करना नहीं।
दुश्मनों से आज से लड़ना नहीं।

दोस्ती में भी दगा मिलता यहाँ।
पागलों सा अब बली चढ़ना नहीं।

लोग मरते हैं लड़ाई कर यहाँ।
आज से पचड़े म अब पड़ना नहीं।

मार के आगे बढ़ा दे जो हमें।
जेल जाके अब हमें सड़ना नहीं।

दम नहीं है बाजुवों में लड़ सकें।
पात के जैसे हमे झड़ना नहीं।

जो किया अच्छा किया तो क्या सरम।
शीश अब अपना कहीं गड़ना नहीं।

लौह की काया नही तेरा दलीप।
बाँस के जैसे हमे फड़ना नहीं।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

आज अंतस ले महूँ मुसकाय हँव।
एक घर अपनो इहाँ बनवाय हँव।

मोर घर ला देख के झन जल सखा।
बैंक वाला ले उधारी पाय हँव।

एक पाई तक बचे नइ हे इहाँ।
कर्ज मा पूरा नरी तक आय हँव।

काम अबड़े बाँच गे हावय अभी।
पाँव चादर ले बड़े फइलाय हँव।

आमदानी हे अठन्नी मोर जी।
रोज रुपिया खर्च कर पछताय हँव।

लोग सोंचत हे बड़ा धनवान हे।
मँय भिखारी ले घलो पिछवाय हँव। 

पेट काटत किश्त ला देहूँ दिलीप।
तब कहूँ मँय आज घर ला पाय हँव।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

एक दिन आही महू ला आस हे।
हार नइ मानँव जहाँ तक साँस हे।

बालटी ला डार के तीरत हवँव।
बून्द तक हा मोर बर तो खास हे।

छोंड़ के कइसे भला जावँव बता।
मोर माटी मोर तन के पास हे।

राह जोहत हँव उहू आही इहाँ।
ओखरो तो नइ बुझाये प्यास हे।

पेंड़ के पंछी उड़े आकाश मा।
लौट के आही इहें बिसवास हे।

पेंड़ के पाना सहीं झरगे सबो।
मोर हाड़ा रेंगथे जस लास हे 

देख आवत हे अभी करिया दिलीप।
सोर होवत हे बरसही आस हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार

गजल

गजल
रूप तोरो देख मन ललचात हे।
मोर अंतस भाव कइसे आत हे।

दूर ले सीटी बजा के छेंड़ दिस।
कोन जाने ओ भला का पात हे।

तोर पाये बर झलक आवय सबो।
का पता ये रूप मा का बात हे।

सोंचथौं तोला बना लेहूँ सखी।
सोंच भर ले आत्मा डर जात हे।

मार देबे तँय कहूँ थपरा अभी।
कुछ कहेबर मोर जी घबरात हे।

घाम के सेती गुलाबी तन दिखे।
मोर सँग जिनगी सदा बरसात हे। 

मुचमुचा के देखही तोला दिलीप। 
राख सकबे तोर का अवकात हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

दर्द मेरी जिंदगी में खास है।
टीस उठती ज्यूँ लगा कोई फाँस है।

सोंचता हूँ जिंदगी के जंग में।
हार से तो मौत आये रास है।

बुज़दिली कहते इसे सायद सभी।
क्या करूँ तकदीर पूरी नास है।

लाज़मी है लोग कायर भी कहें।
इंद्रियां अपनी किसी की दास है।

बेरुखी सी जिंदगी अपनी कटे। 
हर कदम पे मौत सा एहसास है।

काठ का पुतला बना के रख दिया।
जिंदगी तो झण्ड है बकवास है।

देखता हूँ लोग को चलते हुए।
लग रहा जिंदा चले ज्यूँ लास है।

तेज सब का खो गया कैसे दिलीप।
माँ नही, कोई और उसके पास है।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल

मँय घटा करिया के होवत शोर औं।
चुप कराले दे मया मँय तोर औं।

तोर घर के देहरी मा हे कुकुर।
भूँक थे ता लागथे मँय चोर औं।

पा मया हरिया जहूँ कहिके कहे।
तँय बता का मँय खनाये बोर औं।

डूब के रइहूँ कहे तँय मोर ले।
तँय बता का साग के मँय झोर औं?

जब घटा आथे निटोरत रहि जथस। 
नाच के दिखला कहे ,का मोर औं?

बाँध के रखबे कहे परिवार ला।
का समझथस ,मँय ह कोनो डोर औं?

नाम मोरो हे बतावत हँव दिलीप।
तँय हुदर के बोलथस ,का ढोर औं?

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल  

झाँझ हा झुलसात हाबय का करँव।
मँय गरीबी मा पले बपुरा हरँव।

तोर सुख बर मोर हाड़ा हा गले।
घाम पानी ले भला कइसे डरँव।

टोर के पथरा बनाथौं राह मैं।
रात दिन कर काम तन ला मैं छरँव।

जोंत के नांगर उगाथौं धान ला।
कर किसानी पेट सब के मँय भरँव। 

प्यास मा कोनो मरय झन जान के।
मँय कुँआ ला खोद पानी बन झरँव।

भूँख मा बिलखत सबो ला देख के।
सूख के लकड़ी बने आगी बरँव।

कोन बूता बाँच गे हावय दिलीप।
काम करके तोर बर मँय हा मरँव।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल
2122 2122 2122
चिलचिलाती धूप में बोझा उठाये।
कर रहे हैं काम ओ जो घर बनाये।

ईंट गारा सिर रखे ओ जा रहे हैं।
इस धधकती धूप में कित छाँह पाये।

रेत गिट्टी फावड़े से भर रहे हैं।
धूप में ओ दम नही इसको हराये।

बाँस बल्ली के सहारे ओ चढ़ा है।
धूप सीधी है मगर ना तिलमिलाये।

रॉड लोहे की गरम हाथों में लेकर।
छत ढलाई के लिए ऊपर चढ़ाये।

रॉड की जाली बना सब बांधते हैं।
जल रहे हैं हाथ पर ना छाँव आये।

बन गया जो आसियाना छोंड़ सारे।
दूसरों के वासते जा घर बनाये।

आसियाना ये बनाते हैं सभी का।
झोफडी में रह सदा जीवन बिताये।

धूप पानी जाड़ से नाता रहा है।
काम करते हैं कभी ना जी चुराये।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार

गजल

गजल
तर जथे कतको जपे श्री राम के।
झन समझ येला हरे बस नाम के। 

जाप कर हर काम के सँग राम ला।
पुण्य पाबे तीर्थ चारो धाम के।

फेंक झन कचरा समझ के राह मा।
कोन जाने कोन हर हे काम के।

जेन करथे काम निसदिन खान मा।
काय चिंता ओ करे ये घाम के। 

जेन ऐसी मा सदा बइठे रहय। 
तेन के चिंता अपन बस चाम के।

भात ला झन फेंक जादा मांग तँय।
बाप हर जानय रहे का दाम के।

चार साथी मिल जथे बतियाय बर।
बन जथे माहौल हर दिन शाम के।  

हे बुरा ये काम जानत हे सबो।
पर चलाथे दौर बइठे जाम के।

तन बदन हो पस्त बूता काम मा।
तब समझ आथे करँव का बाम के।

बालपन बाबा चलय धर हाथ ला।
अब ददा के हाथ चलथे थाम के। 

जेन मन मिहनत करे निसदिन दिलीप।
तेन मन का सोंचही आराम के।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

गजल

गजल 
2122 1212 22

मोर माथा म का लिखाये हे।
भाग मा मोर काय आये हे।

खीर पूड़ी बने रहे घर मा। 
चोर करिया सबो ल खाये हे।

जेन ले मँय मया करे चाहँव।
तेन दूसर के सँग भगाये हे।

छोड़ दे आज ले गुलामी ला।
तोर पुरखा बहुत बचाये हे।

रात कस हो गये हवय दिन हा।
केंश कोनो सखी सुखाये हे। 

जेन मुखिया बने करे गलती।
तेन थपरा तको जी खाये हे।

हारगे हे कतेक राजा मन।
जेन जनता रहे भुलाये हे।

पाँव ओखर उखड़ जथे साथी।
जेन के नींव डगमगाये हे।

भाग के लाज ला बचा पप्पू।
तोर पाछू कुकुर छुवाये हे।  

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 12 12 22
देख माटी नमी ल खोये हे।
दुःख भारी किसान ढोये हे।

धान पाबो बने यहू बारी
आस भारी सबो सँजोये हे। 

देख के दुख किसान के भारी।
देव बरसा तुरत पठोये हे।

टोर जाँगर किसान हा बोवय।
धान भाँठा रखे सरोये हे।

चोर चोरी करे भगा जाथे।
कोन छेंकय सबो तो सोये हे।

आम कइसे मिले बता संगी।
जेन अँगना बबूल बोये हे।

मार देथे बने रहे हीरो।
हाथ आथे तहाँ ले रोये हे।

ओ मसीहा बने हवय भाई।
पाप के दाग सब ल धोये हे।

मान लेवव दिलीप के कहना।
घाम चुंदी कहाँ पकोये हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल 
2122 1212 22
भूत ठाढ़े कहूँ दुवारी मा।
चीर देबो पकड़ के आरी मा।

जेन रेंगे सकय नही भाई।
तेन दउड़य परे तुतारी मा।

सास झगरा करे ल नइ जानय।
बीत जाथे समे ह चारी मा।

देख गोरी टुरी तको हावय।
मोर हिरदे लगे हे कारी मा।

छेंक नरवा रखव तको गरुवा।
आज घुरुवा बनाव बारी मा। 

देव हर सब करा कहाँ रइही।
भेज देहे मया ल नारी मा।

मोर झगरा बने बढ़े हावय।
रोस आथे बड़ा सुवारी मा।

जेन गुस्सा रहे उड़ा जाथे।
देख आथे मया ह सारी मा। 

सेठ के पेट का समाये हे।
माल पाये दुकान दारी मा।

देह कपड़ा भले रहय झन जी।
घीव खाले मिले उधारी मा।

दाम लेके सबो सताये हे।
भाग जाथे ग मोर पारी मा।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22
मोर मेंछा सबो ल भाये हे।
लोग देखे इहाँ ग आये हे।

पेट बड़का बढ़ाय हे काबर।
देश भीतर रखे पचाये हे।

जेन राजा बने रहे घूमय।
जेल के दार भात खाये हे।

देख पानी बने हवय बैरी।
खेल खेले बिना हराये हे।

देश बर जेन जान दे हावय।
देह तेकर टरक म लाये हे।

मोर रक्षा करे खड़े सीमा।
कोन जाने ओ काय पाये हे।

दुःख आवय उहाँ कभू झन जी।
मोर बेटी जिहाँ बिहाये हे।

मोह लेथे सबो के अंतस ला।
गीत सुग्घर कहूँ सुनाये हे।

कोन कहिथे दिलीप हे बइगा।
देख बिच्छी खुदे भगाये हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22
पेंड़ जबले धरा सिरा गेहे।
देख बादर घलो रिसा गेहे।

आय हावय किसान धर नाँगर।
खेत पथरा सही सुखागेहे।

अब किसानी भला कहाँ होही।
घाम देखे घटा उड़ा गेहे।

हाथ माथा धरे करे चिंता।
रात के दू बजे के जागे हे।

तेल नइ हे दिया म अब साथी।
देख बाती घलो बुझा गे हे।

राख मा कब रहे बता जिनगी।
जेन होथे उही बहा गेहे।

पाँव काँटा गड़े पिराथे जी।
कोन चप्पल धरे भगा गेहे।

ठाँव पाये हवँव बने छइहाँ।
नींद आँखी बने हमा गेहे।

जाग जाबे दिलीप बिहना ले।
काम बूता के दिन ह आ गेहे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22
छंद सीखे सबो सधाये हे।
जेन साधे उही ह पाये हे।

खोल आँखी बने बने देखव।
कोन काला कहाँ लुकाये हे।

आज अठरा घलो कहाँ रहिथे।
देख टूरा टुरी भगाये हे।

ओ जवानी रहय जवानी जी।
चार बाई बबा चलाये हे।

आय हावय परी सरग ले जी।
देख मेंछा बबा मुड़ाये हे।
नाक अँगड़ी कभू करव झन जी।
जेन करथे ओ मार खाये हे।

चोर बनके चुराय हे दिल ला।
बेंच पइसा बहुत कमाये हे।

नाक नकटा के बाढ़ जाथे जी।
लाज ओला कभू न आये हे।

राम के नाम ला भजव भाई।
नाथ बिगड़ी सबो बनाये हे।

मौन रहिके रहय अपन घर मा।
मान जिनगी बने पहाये हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22
तोर खातिर मैं जग म आये हँव।
मार खाके मया ल पाये हँव।

गीत आथे कहाँ बता मोला।
तोर बर गीत गुनगुनाये हँव।

आजकल के टुरी कहाँ भाथे।
जान मेंछा तुरत मुड़ाये हँव। 

जेब पइसा भले तनिक नइहे।
तोर बर सूट मँय ह लाये हँव।

माथ बिंदिया सजा दुहूँ साथी।
तोला पाये परन लगाये हँव।

खून सस्ता हवय मया आगू।
जेन जतका कहे बहाये हँव।

रूप देखे तहाँ मरे कतको।
सादगी तोर मा लुटाये हँव। 

राज के बात मँय बता देथौं।
झूट मँय बोल के रिझाये हँव।

अब तो बनजा दिलीप के साथी।
तोर पग मा ये तन बिछाये हँव।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22
बात मन के अभी बतावन दे।
ठैर थोरिक  जरा नहावन दे।

हीर राँझा सहीं मया करबो।
दिन ओ जुन्ना इहाँ तो आवन दे।

तोर भाई बने कसाई हे।
जान जाही इहाँ ले जावन दे।

मोर बाई अबड़ हवय कारी। 
पाय गोरी कहूँ त पावन दे।

फूल देके कहे मया करथौं।
जिंदगी भर तहाँ लुटावन दे।

मोर मिहनत ल मँय कभू नइ दँव।
खाय सरकार के ल खावन दे।

चोर चोरी करत फँसे हावय।
ठैर थोरिक अभी ठठावन दे। 

साँप आस्तीन मा रहय साथी।
कोन बइठे अभी झड़ावन दे।

धर के नाँगर दिलीप जावत हच।
मेघ करिया बने तो छावन दे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22 
हार के सुध अपन गँवाये हे।
रोज रो के करम ठठाये हे।

ज्ञान बाँटत रहे बने ज्ञानी।
बाप बेटा दुनो धराये हे।

नाम बड़का रहय अमीरी मा।
लूट पइसा सबो भगाये हे।

बाप के नाम मा बने नेता।
सीठ अपने कहाँ बचाये हे।

कोन दीदी भला कहे ओला।
जेन भाई के घर जलाये हे।

कोन मछरी फँसे कहाँ कइसे।
जाल माया सदा बिछाये हे।

जेन सपना प्रधान के देखय। 
एक नेता बना न पाये हे।  

आय हावय इहाँ बने मंत्री।
जेन जीते उही डहर धाये हे।

लूट भाँटो धरे रहय पइसा।
आज सारा सबो लुटाये हे।

झन भरोसा कभू करव भाई।
भाई भाई ल ये लड़ाये हे।

छोड़ दय देश ला हमर ओमन।
जेन असहिष्णुता बताये हे

देश मा सब दिलीप के जइसे।
बाँट पइसा सबो ल खाये हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
2122 1212 22 

जब ले बाई सुराग पाये हे।
जान मुश्किल म मोर आये हे।

दान दाता हवय इहाँ भारी।
भीख मंगा बहुत बनाये हे।

हार पहिरे गली म झन जाबे।
दिन दहाड़े बहुत लुटाये हे।

कोन बिसवास अब करे बतला।
भाई भाई ल अब ठठाये हे।

भाग जाथौं उँखर दुवारी ले।
देख करिया कुकुर बँधाये हे।

सोर करथे हमर ददा दाई।
दुःख पा के बड़े बढ़ाये हे।

जब ले बेटा दलीप के बाढ़े।
रात दिन बोल के पकाये हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल 
221 2122 221 2122

कागज कलम उठा के, लिख दे बबा ल पाती।
आजाय घर म राहय, अपनो जुड़ाय छाती।

दारू पिए के खातिर, झगरा मताय घर मा। 
करथे बड़ा बहाना,नइ दय बहू चपाती।

हलवा दबा के खाथे, ठंडा कभू न भावय। 
माँगत रहे हमेसा, दिन होय चाहे राती।

पुरखा अपन गिनाथे, राहय कतेक मंडल।
अबतो गुजर चलत हे, बाँचे इहाँ न बाती।

चलथे मुड़ी उठाये, जइसे रहे ओ राजा।
बाँटत रहे खजाना,रसता म आती जाती। 

कइसे दिलीप काहय, झन शान अब दिखा गो।
दारू ल छोड़ दे तँय,बिगड़त हवय ग नाती।

दिलीप कुमार वर्मा
23-7-2019

गजल

गजल
221 2122 221 2122

बसरी बजा बलाथे, दउड़े सबो जी आवय।
कान्हा के मोहनी मा,गोपी सबो फँसावय।

राधा धरे घड़ा ला,जमुना के तीर आथे।
सुन बांसुरी ल राधा,सुध बुध अपन भुलावय।

मनखे के बात छोड़व,गरुवा तको भुलागे।
गइया खड़े निहारय,चारा तनिक न खावय।

जइसे रहय सवाँगा, तइसे भगाय गोपी।
राहस रचाय कान्हा, तुरते ठउर म जावय।

कान्हा करे हे लीला,माया अपन दिखा के।
फँसगे दिलीप जइसे, माया सबो म छावय।

दिलीप कुमार वर्मा
23-7-2019

गजल

गजल
221 2122 221 2122

राजा बने भिखारी,जे मन नशा करत हे।
रहिथे जवान तब ले, कमजोर हो मरत हे।

बाढ़े जे भाव भारी,देखव पताल के जी।
आये समे ग अइसे, रसता म ओ सरत हे।

भगवान के कभू जी,दीखय नही ग लाठी।
करनी करे ग जइसे, तइसे इहाँ भरत हे।

भारत बढ़ाय ताकत,जे चन्द्रयान भेजे।
दुनिया करे बड़ाई,कतको मगर डरत हे।

ये मानसून देखव,धोखा करे हे भारी।
बरसात में न आये, सब धान हा जरत हे।

बारी उजाड़ देथे,आ बेंदरा ह भाई।
हे खेत मा उन्हारी,गरुवा सबो चरत हे।

रुकजा दिलीप थोरिक, छइहाँ हवय थिराले।
झन भाग पाय पइसा,तन तोर बड़ छरत हे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
23-7-2019

गजल

गजल
221 2122 221 2122

सुख्खा परे किसानी,देखव किसान रोवय।
बाती असन बरागे,कइसे ग धान होवय।

वादा करे हकन के,अब दाँत ला निपोरे।
पइसा तको सिरागे, अब मान तक ल खोवय।

रसता परे हे पथरा, सब रोज के हपटथे।
सरकार हर हटाही, सन्देश ला पठोवय

बरसात के महीना, मच्छर अबड़ पनपथे।
कूलर भराय पानी, कइसे मजा म सोवय।

लइका चलाय गाड़ी,अब्बड़ भगाय देखव।
सम्हले न जे अचानक,जिनगी ले हाथ धोवय।

मझधार मा फँसे हे, ये नाव जिंदगी के।
अब कोन हा बचाही, पीरा दिलीप ढोवय।

दिलीप कुमार वर्मा 
23-7-2019

गजल

गजल   
221 2122 221 2122

पुरखा बनाय रसता, सब ध्यान से चलव जी।
जइसन चले जमाना, तइसन अपन ढलव जी।

भाई ल लूट खाये,अब तँय बता का पाये।
ले झूठ के सहारा, अपनो ल झन छलव जी।

आये नवा जमाना, परिवेश हर बदल गे।
पहिरे ल देख के अब, झन हाथ ला मलव जी।

अँधियार हे गली हा, कब काय होय जाही
भटके दिखाव रसता,दिनरात तुम जलव जी।

अबड़े बुराई जग मा,देखे दिलीप रोवय।
पश्चिम ल छोंड़ देवव,अपने म तुम पलव जी।

दिलीप कुमार वर्मा

गजल

गजल
221 2122 221 2122
फोटो खिंचाय खातिर सब पेंड़ ला लगाथे। 
गरुवा चरे कभू ता काहाँ बचाय आथे।

झन भाग के सहारा बइठे अगास जोहव।
मिहनत करे इहाँ जे,तेने ह दाम पाथे।

कतको पढ़े लिखे तँय,बइठे कहूँ निठल्ला
बेटा करे कमाई तब्भे ददा ह भाथे।

कतको बड़े खिलाड़ी,पर मान नइ ग पावय।
ओ नाम ला कमाथे मेडल जे जीत लाथे।

करके सखा भलाई,दरिया म फेंक दे तँय।
जे आसरा करे ते, मुँह के सदा ओ खाथे।

करथे कमाई भारी रहिथे तभो उधारी।
ओमन सदा खुशी हे, जेमन ह कुछ बचाथे। 

सुनले दिलीप कहना,पुरखा बताय रसता।
पाथे बने ठिकाना,जेमन उही म जाथे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल
221 2122 221 2122

दाई ह जे लगाए,मखना फरे हे भारी।
कइसे बरी बनाहूँ, नइ दार दय उधारी।

करुहा रहे करेला,छछले ग नार हावय।
सावन लगे महीना, सुग्घर लगत हे बारी।

घपटे हवय घटा हा,बिजुरी तको चमक गे।
धरती अबड़ पियासे,बरसा करा रे कारी।

कतको करे किसानी,धनवान हो न पावय।
करजा लदाय रहिथे,मरना अभी हे जारी।

सब लोग जाय रेंगत,जल पान फूल धरके।
रतिहा ले भीड़ लामे,भगवान के दुवारी।

ईमान के कहाँ अब,मिलथे इहाँ ठिकाना। 
अवसर मिले जिहाँ भी,जम के चलाय आरी। 

भाई रहे न भाई,का दोसती ल कहिबे।
स्वार्थ म सब जुड़े हे, धरके रहय कटारी।

चाँउर दिलीप चाबे,खटिया म हे बँधाये।
जोहत अगास हावय,कब मोर आय पारी।

दिलीप कुमार वर्मा
24-7-2019

गजल

गजल
221 2122 221 2122

मनखे अजीब हावय,जाने कहाँ ले आथे। 
हपटत रहे मरत ले,मरथे तभेच जाथे।

कुकरा रिसाय हावय, नइ हे हमर पुछारी।
सूते रहे जवनहा, बज के घड़ी जगाथे

गरमी म सब पियासे, पीये मिले न पानी।
बरसात के महीना, पानी सबो बहाथे।

नदिया ल बाँध डारव, तरिया बनाव भाई।
पानी करव इकट्ठा,गरमी म काम आथे।

बखरी गड़े बबा हा,कोड़त हवय ग बारी।
गोभी पताल भाटा, घर मा तभेच पाथे। 

घर मा कुकुर बँधाये,गरुवा रहे सड़क मा।
जइसन मिले न खाना,तइसन कुकुर ह खाथे।

काबर दिलीप सोंचे, दुनिया के काय होही।
देखत हवय विधाता,सब ला उही नचाथे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

गजल

गजल    गाँव
221 1222 221 1222

अब गाँव कहाँ मिलथे,सब ओर शहर हाबे।
कंक्रीट के हे जंगल, तँय जेन डहर जाबे। 

माटी के न भिथिया हे, खपरा के न हे छान्ही।
ढेंकी न मिले कुरिया,जा गाँव म पछताबे।

खलिहान भरे कचरा,कोठा ह परे सुन्ना।
अब भूंख मरे मुसुवा,घर अन्न कहाँ पाबे। 

सब पेंड़ कटा गे हे, तरिया ह पटा गे जी।
भाँठा न मिले खोजे,सब घेर रखे दाबे।

दइहान गवाँ गे हे,घुरुवा न मिले संगी।
कचरा म पटे बखरी,का साग भला खाबे।

पहिचान सिरा गे हे, सब गाँव के सुन भाई।
रख आस कहूँ जाबे,धर काय भला लाबे।

ओ गीत कहाँ बनथे,जे गीत गवइहाँ हो।
अब कोन जहुरिया हे, का गीत मया गाबे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार