Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल

जब अति हो जाय कोनो बात जी।
तब समझलव मार देथे लात जी।

बड़ सुहाथे जब गिरे पानी सखा।
पर डरा देथे बढ़े बरसात जी।

घाम हाड़ा बर बने होथे कहे।
पर जला देथे बढ़े जे तात जी।

साँझ कन निकले सबो घूमत रहे।
पर डरा देथे ओ घपटे रात जी।

चाहथे सबझन गुलाबी जाड़ ला।
पर सहे नइ जाय ठंडा घात जी।

साँस बर सब ला हवा चाही इहाँ।
जे बने तूफान बिगड़े बात जी।

आग बिन खाना बने नइ मानथौं।
पर बढ़े जे आग देथे मात जी।

चाहथे पानी रहय नदिया सबो।
बाढ़ दिखलाथे हमर अवकात जी।

हे गरीबी सोंच झन जादा दिलीप
छटपटावत हे अमीरी रात जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

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