पद
पद के पावत ले सबो, गरुवा कस बन जाय।
कतको ताना मार ले, मुड़ नइ तनिक हिलाय।
जोरे रहिथे हाथ ला, पाँव परे हरबार।
मीठ मीठ हरदम कहे, देवय पाँव पखार।
बपुरा कस सूरत दिखे, लागत हे लाचार।
एक वोट ला पाय बर, आवय बारम बार।
लालच के पुड़िया धरे, रतिहा कुन घर आय।
दाई माई बोल के, चुपके से दे जाय।
कसम तको खावत रथे, करिहँव पूरा काम।
निसदिन सेवा मा रहूँ, करँव नही आराम।
पानी बिजली अउ सड़क, तुरते दँव निरमाय।
रोटी कपड़ा अउ भवन, सबके सबझन पाय।
साँच साँच काहत हवँव, मानव कहना मोर।
फर फर जम्मो हे तुँहर, देहू मोला झोर।
मीठ मीठ सब बोल के, हम ला रथे फँसाय।
जीत जथे इक बार जे, तहाँ दरस नइ आय।
सिंग हलावत मारथे, गरुवा बनथें शेर।
जूँ नइ रेंगय कान मा, कतको दे तँय टेर।
जइसे चतुरा कोलिहा, तइसे येखर काम।
गिरगिट कस बदलत रथे, पल पल माँगय दाम।
बार बार जाबे कहूँ, देथे ओ गुर्राय।
मुँह अउ नाक सिकोड़थे, थोरिक ओ नइ भाय।
धुर्रा मा रेंगय नही, मखमल टाट बिछाय।
कीरा लागन हम सबो, ओ राजा बन जाय।
पाँव पखारय जे कभू, घर घर बासी खाय।
आज उही के पाँव हर, धरती मा नइ आय।
कलजुग के राजा बने, धरे कभू नइ धीर।
मास रहे नइ तन तनिक, थामत हे समसीर।
अइसन राजा के प्रजा, लोहा चना चबाय।
दूध मलाई छोंड़ के, सुक्खा रोटी खाय।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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