गजल
2122 1212 22
मोर मेंछा सबो ल भाये हे।
लोग देखे इहाँ ग आये हे।
पेट बड़का बढ़ाय हे काबर।
देश भीतर रखे पचाये हे।
जेन राजा बने रहे घूमय।
जेल के दार भात खाये हे।
देख पानी बने हवय बैरी।
खेल खेले बिना हराये हे।
देश बर जेन जान दे हावय।
देह तेकर टरक म लाये हे।
मोर रक्षा करे खड़े सीमा।
कोन जाने ओ काय पाये हे।
दुःख आवय उहाँ कभू झन जी।
मोर बेटी जिहाँ बिहाये हे।
मोह लेथे सबो के अंतस ला।
गीत सुग्घर कहूँ सुनाये हे।
कोन कहिथे दिलीप हे बइगा।
देख बिच्छी खुदे भगाये हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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