Friday, 7 February 2020

गोपी छंद

गोपी छंद 

गाँव के माटी चंदन हे। 
लगा के माथा बन्दन हे।  

महक माटी के हर भाथे।  
बरस पानी हर जब आथे। 

सनाये लइका मन खेलें। 
सबोझन चिखला मा ठेलें।  

ददा दाई के नइ माने।
मजा कतका हे सब जाने।

किसानी बर माटी राजा। 
डार गोबर करले ताजा। 

सोन कस धान बने पाबे। 
तहाँ गुन माटी के गाबे।  

लाल पिवरा हाबे माटी। 
कहूँ करिया पाबे माटी। 

रहे भूरा चिक्कट माटी। 
इहाँ मिलथे बिक्कट माटी।  

इहाँ घर कुरिया माटी के। 
खेल हे भौंरा बाँटी के। 

देवता माटी के बनथे। 
आसथा मा जम्मो सनथे।   

दिया चुकिया पोरा पाबे। 
धरे दुहना मरकी लाबे। 

सबो माटी के बन जाथे। 
गाँव मा जे जाथे पाथे। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार





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