मुखड़ा छंद
हमर देश कस ये दुनिया मा, नइ पाबे परिवेश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
पूरब पश्चिम अउ दक्षिण हर, सागर मा घेराय हे।
उत्तर कोती खड़े हिमालय, शान अपन दिखलाय हे।
दुश्मन कोनो आ नइ पावय, कतको राखय तेश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
गरमी बरसा अउ जाड़ा के, मजा इहें मिलपाय हे।
आवत हे जब ऋतु बसन्ती, सब के मन हर्षाय हे।
ना जाड़ा ना गरमी ज्यादा, सुग्घर हे परिवेश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, सब के इहें निवास हे।
भारत भुइयाँ के माटी हर, सब ला आवत रास हे।
अलग अलग जाती अउ भाखा, नइ पहुँचावय ठेश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
मंदिर के घण्टा ला सुन के, मन पबरित हो जात हे।
अल्ला हू अकबर के बानी, सुनके मन हरसात हे।
गुरु नानक के अमरित बानी, काटत हवय कलेश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
ईद हरेली क्रिसमस होली, रंग रंग त्यौहार हे।
दीप जलावत आय दिवाली, भाई चारा सार हे।
रंग बसन्ती चोला पहिरे, भंगड़ा वाला देश जी।
दुसर जगा मा जब भी जाबे, खा जाबे तँय भेष जी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 4-1-2020
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