गजल
दर्द मेरी जिंदगी में खास है।
टीस उठती ज्यूँ लगा कोई फाँस है।
सोंचता हूँ जिंदगी के जंग में।
हार से तो मौत आये रास है।
बुज़दिली कहते इसे सायद सभी।
क्या करूँ तकदीर पूरी नास है।
लाज़मी है लोग कायर भी कहें।
इंद्रियां अपनी किसी की दास है।
बेरुखी सी जिंदगी अपनी कटे।
हर कदम पे मौत सा एहसास है।
काठ का पुतला बना के रख दिया।
जिंदगी तो झण्ड है बकवास है।
देखता हूँ लोग को चलते हुए।
लग रहा जिंदा चले ज्यूँ लास है।
तेज सब का खो गया कैसे दिलीप।
माँ नही, कोई और उसके पास है।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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