Friday, 7 February 2020

सार छंद

सार छंद 

तू जो मुझको जरा निहारे, मैं भी तुझे निहारूँ। 
अरमानों की डोली वाली, दिल ये तुझपे वारूँ। 

फिर अंतस मन भौंरा झूमे, चक्कर निशदिन काटे। 
तेरे गम मेरे हो जाएं,  सुख सब तेरे बाटे। 

रोज गुलाबी फूल लिए मैं, तुझसे मिलने आऊँ। 
मीठी बातें तुझसे करके, तुझको सदा रिझाऊँ। 

बैठे बैठे सपने देखें, अपना जहाँ बसाने। 
दूर गगन की छाँव तले हम,घर अपना भी पाने। 

जंगल झाड़ी नदी पहाड़ी, आँगन होगा अपना । 
नन्हे मुन्ने बच्चे खेलें, पूरा होगा सपना।  

मीठी सी मुस्कान बिखेरो, जरा पास तुम आके। 
बढ़े हौसला मेरा भी जो, देखे तूँ मुसकाके। 

पर तूँ मुझको भाव दिए बिन, चली गई इतराके। 
सपने चकना चूर हुए सब, नींद खुली तब जाके।  

किसके सपने होते पूरे, साथी जरा बताओ। 
रात गई तो बात गई सब, तुम भी अब बिसराओ।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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