गजल
2122 2122 2122
चिलचिलाती धूप में बोझा उठाये।
कर रहे हैं काम ओ जो घर बनाये।
ईंट गारा सिर रखे ओ जा रहे हैं।
इस धधकती धूप में कित छाँह पाये।
रेत गिट्टी फावड़े से भर रहे हैं।
धूप में ओ दम नही इसको हराये।
बाँस बल्ली के सहारे ओ चढ़ा है।
धूप सीधी है मगर ना तिलमिलाये।
रॉड लोहे की गरम हाथों में लेकर।
छत ढलाई के लिए ऊपर चढ़ाये।
रॉड की जाली बना सब बांधते हैं।
जल रहे हैं हाथ पर ना छाँव आये।
बन गया जो आसियाना छोंड़ सारे।
दूसरों के वासते जा घर बनाये।
आसियाना ये बनाते हैं सभी का।
झोफडी में रह सदा जीवन बिताये।
धूप पानी जाड़ से नाता रहा है।
काम करते हैं कभी ना जी चुराये।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
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