Sunday, 9 February 2020

आल्हा छंद

आल्हा छंद- दिलीप कुमार वर्मा 

छेरछेरा

पुन्नी के दिन पूस महीना, लइका मन सब गावत जाय।

छेरिक छेरा छेर मरकनिन, कहिके घर घर मा चिल्लाय।

कोनो धरके जावय झोला, कोनो टुकना ला धर जाय।

कतको झन चुमड़ी धर जावय, खोंची खोंची सबझन पाय।  

दान करइया बइठे रहिथे, टुकना मा ओ भरके धान। 

जे आवय तेला ओ देवय, सिरा जवय ता फिर दय लान। 

का लइका का बुढ़वा कहिबे, जम्मो झनमन पावय दान। 

छत्तीसगढ़ बर जानव भइया, अन्न दान हे परब महान। 

ढोल मजीरा तासा बाजय, भजन मंडली टोली जाय। 

राम धुनी मा नाचय गावय, तहाँ दान बिकटे ओ पाय। 

चहल पहल सब गली गाँव मन, आवत जावत रेलम रेल। 

सबके मन उल्लास भरे हे, खुसी खुसी घूमय जस खेल। 

पाय धान ला बेंच भाँज के, पुन्नी मेला देखे जाय।  

रंग रंग के खई खजाना, पइसा मा सब ले के खाय।  

ऊपर वाला ले बिनती हे, सब घर होवय अबड़े धान। 

परब छेर छेरा मा भइया,  हँसी खुसी सब देवय दान।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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