गजल
झाँझ हा झुलसात हाबय का करँव।
मँय गरीबी मा पले बपुरा हरँव।
तोर सुख बर मोर हाड़ा हा गले।
घाम पानी ले भला कइसे डरँव।
टोर के पथरा बनाथौं राह मैं।
रात दिन कर काम तन ला मैं छरँव।
जोंत के नांगर उगाथौं धान ला।
कर किसानी पेट सब के मँय भरँव।
प्यास मा कोनो मरय झन जान के।
मँय कुँआ ला खोद पानी बन झरँव।
भूँख मा बिलखत सबो ला देख के।
सूख के लकड़ी बने आगी बरँव।
कोन बूता बाँच गे हावय दिलीप।
काम करके तोर बर मँय हा मरँव।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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