गजल
221 2122 221 2122
बसरी बजा बलाथे, दउड़े सबो जी आवय।
कान्हा के मोहनी मा,गोपी सबो फँसावय।
राधा धरे घड़ा ला,जमुना के तीर आथे।
सुन बांसुरी ल राधा,सुध बुध अपन भुलावय।
मनखे के बात छोड़व,गरुवा तको भुलागे।
गइया खड़े निहारय,चारा तनिक न खावय।
जइसे रहय सवाँगा, तइसे भगाय गोपी।
राहस रचाय कान्हा, तुरते ठउर म जावय।
कान्हा करे हे लीला,माया अपन दिखा के।
फँसगे दिलीप जइसे, माया सबो म छावय।
दिलीप कुमार वर्मा
23-7-2019
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