कुंडलियाँ
मुसुवा कस दुबके रहव,कहत हवय ये जाड़।
पानी झन छूहू सगा, जम जाही जी हाड़।
जम जाही जी हाड़, हला नइ पाहू तन ला।
चल नइ पाही पाँव, बतादव तुम जन जन ला।
जाहूँ कहूँ नहाय, बरफ कस होहू कुसुवा।
ओढ़ रजाई देख, लुकावव जइसे मुसुवा।
पूस महीना मा घटे, बहुत पुराना बात।
हलकू जबरा के कथा, रहे पूस के रात।
रहे पूस के रात, जाड़ ले हलकू हारे।
आफत मा जब जान, रहे जबरा पोटारे।
फसल जाय ते जाय, जाड़ मा मुस्कुल जीना।
उही जाड़ फिर आय, लगे हे पूस महीना।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 3-1-2020
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