गजल
2122 2122 2122
जो हमारे चित्त में चिंता है घरता।
ओ हमारे चित्त में अवसाद भरता।
चित्त में चिंता कभी ना पालना तू।
ये सदा ही देह को नुकसान करता।
सोंचना तो ठीक है पर ध्यान रखना।
सोंच ज्यादा भी हमारे कान भरता।
जो कहे बिन सोंच के ओ भी फसे हैं।
बाद में ओ बोलने से रोज डरता।
मानता हूँ सोंच से हल हो सका है।
सच बताओ सोंच के है कौन मरता।
सोचने से ब्रेन भी लाता कयामत।
काम आये देश के तो ना अखरता।
सोंच कर देखो कहाँ तक सोंचते हो।
ये दिलीप के दुःख को भी मौन हरता।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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