गजल
221 1222 221 1222
ये देश के मौसम हा,हर बार बदल जाथे।
मौसम ह गा जे आथे,बरबाद करे आथे।
गरमी के ओ मौसम मा,आगी के करे बरसा।
झुलसात रहे भारी,तब चैन कहाँ पाथे।
बरसात महीना मा,पानी के रहे रेला।
घर फूट जथे कतको,आफत ल धरे लाथे।
जब जाड़ महीना हो,हाड़ा ल कँपा देवय।
अउ खून जमे नस मा,तब कोन भला भाथे।
सँच बात कहँव संगी,मौसम ह सबो अच्छा।
ये देश हमर अइसे, हर हाल म ढल जाथे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment