गजल
2122 1212 22
जब ले बाई सुराग पाये हे।
जान मुश्किल म मोर आये हे।
दान दाता हवय इहाँ भारी।
भीख मंगा बहुत बनाये हे।
हार पहिरे गली म झन जाबे।
दिन दहाड़े बहुत लुटाये हे।
कोन बिसवास अब करे बतला।
भाई भाई ल अब ठठाये हे।
भाग जाथौं उँखर दुवारी ले।
देख करिया कुकुर बँधाये हे।
सोर करथे हमर ददा दाई।
दुःख पा के बड़े बढ़ाये हे।
जब ले बेटा दलीप के बाढ़े।
रात दिन बोल के पकाये हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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