श्रृंगार छंद
बबा के कहना ला तँय मान।
धरे अमरित कस हावय ज्ञान।
सबो अनुभव के हावय सार।
मान के अपन आप ला तार।
ददा दाई के कहना मान।
तभे तो तोर बने पहिचान।
बना के सीढ़ी झन तँय सोंच।
मास ला झन खा तँय हर नोंच।
जेन दाई के करथे मान।
तेन के उमर बढ़त हे जान।
ददा के छाँया जे मिलजाय।
जनम भर कब्भू दुख नइ पाय।
ददा दाई ला राखव संग।
छाय जीवन मा सुग्घर रंग।
करव सेवा ला सुग्घर यार।
तहाँ फिर खुसी रहे संसार।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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