गजल
221 2122 221 2122
राजा बने भिखारी,जे मन नशा करत हे।
रहिथे जवान तब ले, कमजोर हो मरत हे।
बाढ़े जे भाव भारी,देखव पताल के जी।
आये समे ग अइसे, रसता म ओ सरत हे।
भगवान के कभू जी,दीखय नही ग लाठी।
करनी करे ग जइसे, तइसे इहाँ भरत हे।
भारत बढ़ाय ताकत,जे चन्द्रयान भेजे।
दुनिया करे बड़ाई,कतको मगर डरत हे।
ये मानसून देखव,धोखा करे हे भारी।
बरसात में न आये, सब धान हा जरत हे।
बारी उजाड़ देथे,आ बेंदरा ह भाई।
हे खेत मा उन्हारी,गरुवा सबो चरत हे।
रुकजा दिलीप थोरिक, छइहाँ हवय थिराले।
झन भाग पाय पइसा,तन तोर बड़ छरत हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
23-7-2019
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