जयकारी छंद
हाड़ मास के पुतला ताय,जाने कब दुनिया ले जाय।
मोह मया काबर ग बढाय, जाये बेरा बड़ पछताय।
जाने कब ये छोड़य साँस, घर वाला मन बाँधे आस।
तोर रहइ नइ आवय रास, कर अब थोरिक तँय बिसवास।
देखे बर जम्मो सकलाय, दुरिहा वाला तको बलाय।
लगथे आजे ही निपटाय, तब्भे दूध दही चटवाय।
जइसे होही मरना तोर, रोवत जम्मो करही शोर।
ले जाही होते सब भोर, पटक दिही बस्ती के छोर।
लकड़ी छेना धर सकलाय, चिता बना के तुरत जलाय।
आनी बानी सब बतियाय, तोला जम्मो रहे भुलाय।
नहा खोर के घर मा आय, चाँट चाँट सब कढ़ी उड़ाय।
दसवा दिन दावत बुलवाय, हाँस हाँस के सबझन खाय।
इही तोर होही अंजाम, तेखर ले करले कुछ काम।
भज ले मनवा सीता राम, आखिर मा जाबे हरि धाम
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 5-2-2020
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