सवैया
लात परे न परे लउठी, तब ले गिंगियावत रोय किसान।
जावत खेत सुखाय गये, जब देख बरावत हे सब धान।
सावन मास लगे फिर भी,बरसा कर बून्द गिरे नइ जान।
मूड़ धरे अब सोंचत हे, बरसा बिन छूट जही ग परान।
बादर आवत जावत हे, पर ओ बरसात न लावत हे।
सूरज हा बनके बयरी,बस घाम इहाँ बरसावत हे।
रोज इहाँ गरजे घुड़के,बस मेघ मल्हार ल गावत हे।
दाँत दिखावत हे बिजुरी,चमके दमके इतरावत हे।
दिलीप कुमार वर्मा
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