Friday, 7 February 2020

गोपी छंद

गोपी छंद 

जवानी जल्दी जावत हे। 
बुढापा हर तिरियावत हे।  

ढरत हे सूरज हा देखव। 
कहत हे छेंकव रे छेंकव।  

बाल हर रंगत खोवत हे।  
मुड़ी हर चँदवा होवत हे। 

गोड़ मा पीरा हे भारी। 
कहाँ बाँचत हे नर नारी। 

दाँत हर जम्मो खोगे हे।  
चपलवा मुँह हर होगे हे। 

छबा गे सूरत मा झुर्री। 
लगे जस तापे हे भुर्री। 

कान हर होवत हे भैरा। 
पेट हर लागत हे पैरा।  

लगे आँखी हर पतरागे। 
मुहाटी भिथिया कस लागे। 

जीभ हर अबड़े ललचावय। 
पेट मा दाना नइ जावय। 

पचे नइ खाये जे खाना। 
देह हर होवत जस पाना

दिखत हे ऊपर ले पसली।  
कहाँ गय गबरू ओ असली। 

कुकुर कस कनिहा हर होगे।  
जवानी के करनी भोगे। 

चार दिन के हे जिनगानी।  
पेर देवत हे जस घानी

मोह ला छोंड़त जाना हे। 
इहाँ कखरो न ठिकाना हे।  

गरब झन करबे तँय भाई। 
फूट जाथे तन जस लाई। 

उड़ाथे एक फूक मारे। 
बड़े योद्धा मन तक हारे। 

सबो के एक ठिकाना हे। 
एक दिन सब ला जाना हे।  

मोह झन करहू तन ले जी। 
करव परमारथ मन ले जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार


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