माहिया
मँय प्यार की प्यासी हूँ।
हूँ मँय इक बिरहन।
कान्हा की दासी हूँ।
कुछ लोग मुझे कहते।
तू झरना पावन।
झरझर आँसू बहते।
एक बार चले आओ।
कर दो कृपा मुझपे।
नैनो में समा जाओ।
अँखियाँ भी सूख गई।
राह बिछाए नैन।
मूर्ति पत्थर सी भई।
अब हार लगे भारी।
तन हो सुखी काठ।
पर आस नही हारी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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