Friday, 7 February 2020

आनंद वर्द्धक छंद

आनंद वर्द्धक छंद 

2122 2122 212

भोकवा बनके, कभू तँय झन रबे।

बात जब सच्चा हवय, खुल के कबे।

कोन ला डरथच, सबो जग तोर ये। 

जे बुरा करथे डरे, सब चोर ये।

तोर धरती तोर अम्बर, मान ले। 

सम्पदा सब तोर ये, सब जान ले। 

तोर मिहनत के भरोसा, सब जिये। 

तोर देहे जल इहाँ, सबझन पिये। 

तँय उगाथस धान, खावत हे सबो। 

तोर दे परसाद, पावत हे सबो। 

फिर बता का बात ले, तँय हर डरे। 

बिन करे अपराध, काबर तँय मरे। 

घर उखर होही भले, कोठी महल। 

तोर बिन मिहनत करे, जाथे दहल। 

कोन करही काम, ओखर घर बता। 

झन डरा मनखे हरे, हिम्मत जता।  

बेच झन ईमान ला, धनवान ले। 

ओ हरे बइमान तँय, पहिचान ले। 

तोर धन ईमान, इज्जत हे सखा। 

पाठ दे पढ़वा, उहू ला दे चखा। 

दे हवय भगवान, ये सब तोर ये। 

जेन लूटत हे इहाँ, सब चोर ये। 

कोठरी मा बंद कर, ताला लगा। 

हौसला भरले, अपन हिम्मत जगा। 

झन डरा अइसन, लुटेरा चोर ले। 

का भला पाही सखा, ये तोर ले। 

आज करबे काज, खाबे आज तँय। 

रोज के मिहनत करे, सब काज तँय। 

दिलीप कुमार वर्मा



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