Friday, 7 February 2020

गोपी छंद

गोपी छंद 

मार के तोला मर जाहूँ। 
तभे अंतस ले सुख पाहूँ। 

करे करनी हावस भारी। 
मोर मरना हे लाचारी।  

करम सब देखत हे तोरो। 
कटादे नाक तको मोरो। 

बता कइसे मुँह ला ढाँकौं। 
कोन कोती ले मँय झाँकौं।  

बात मोरो तँय नइ माने। 
अपन ला बड़ ज्ञानी जाने। 

फँसा दे हावस तँय मोला।  
बतावँव का अब मँय तोला। 

जवानी सबझन के आथे। 
कहानी सबके बन जाथे। 

मगर बदनामी तँय लादे। 
उमर तँय मोरो ला खादे। 

चढ़ा दय फाँसी मा तोला। 
उड़ा दय बाँधे बम गोला। 

भूंज दय मार मार गोली। 
गड़ा दय तीन हाथ खोली।  

बहिन बेटी ला नइ जाने।   
नता रिसता ला नइ माने। 

गड़ाये आँखी रे फुटहा। 
निचट तँय हावच रे कुटहा। 

बने होतिस तँय मर जाते। 
हमर दुनिया मा नइ आते। 

जान आफत मा तँय डारे। 
ददा ला जीयत मा बारे।  

कलप के रोवत हे दाई। 
मातगे हावय करलाई। 

जेल मा बेटा के रहना। 
नरक कस जिनगी हे सहना। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार



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