Friday, 7 February 2020

पीयूष वर्षी छंद

पीयूषवर्षी छंद   

2122 2122 212 

देख चंदा देख, सूरज आय हे। 
तोर अँगना देख, उज्जर छाय हे। 

घोर करिया रात, तुरते भाग गे। 
तोर अँगना देख, किस्मत जाग गे। 

अब उजाला तोर, घर के शान हे। 
जगमगावत द्वार, अब पहिचान हे। 

जेन देखे तेन, अचरज हे इहाँ। 
घाम कइसे होय, रतिहा हे जिहाँ। 

चरमरावत ओस, सब्बो सूख गे। 
घाँस गरमी देख, जम्मो रूख गे। 

पाँव जरथे चाँय, खुल्ला जे रहे। 
घाम के ये ताप, जिनगी नइ सहे। 

प्यास मरगे लोग, गरुवा रोय हे। 
आय सूरज द्वार, नरमी खोय हे। 

पेड़ पौधा सूख, ठुड़गा कस दिखे। 
हाल अइसन देख, चंदा का लिखे। 

रात शीतल छाँव, सबके मन बसे। 
कोन कहिथे रात, कोनो ला डसे।

जब घपटथे रात, चलथे जे हवा।  
घाम मा मुरझाय, तन बर हे दवा।  

ये चँदैनी देख, मन मुसकाय जी। 
जोगनी कस रात, सुग्घर भाय जी। 

जब अँजोरी रात,चंदा हा रहे। 
सब डहर उजियार, रतिहा ला दहे। 

घाम ले अच्छा ग, अब तो रात हे। 
आज चंदा रात, अब सौगात हे। 

सब सफर करथे ग, अब तो रात मा। 
घाम सब ला भाय, अब बरसात मा।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार


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