गजल
दोस्तो से दोस्ती करना नहीं।
दुश्मनों से आज से लड़ना नहीं।
दोस्ती में भी दगा मिलता यहाँ।
पागलों सा अब बली चढ़ना नहीं।
लोग मरते हैं लड़ाई कर यहाँ।
आज से पचड़े म अब पड़ना नहीं।
मार के आगे बढ़ा दे जो हमें।
जेल जाके अब हमें सड़ना नहीं।
दम नहीं है बाजुवों में लड़ सकें।
पात के जैसे हमे झड़ना नहीं।
जो किया अच्छा किया तो क्या सरम।
शीश अब अपना कहीं गड़ना नहीं।
लौह की काया नही तेरा दलीप।
बाँस के जैसे हमे फड़ना नहीं।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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