आनंद वर्द्धक छंद
2122 2122 212
सुन सुनावत हँव कहानी, गाँव के।
छत्र छाँया पाय, पीपर छाँव के।
हे जिहाँ तरिया कुआँ, चारो डहर।
खार मा नरवा चलत हे, अउ नहर।
लीम पीपर बर लगे हे, पार मा।
धान ले खेती सजे हे, खार मा।
गाय बछरू ले भरे, कोठार हे।
दूध नदिया के इहें तो, धार हे।
फूल महकत हे, सबो घर द्वार मा।
कोयली कुहकत हवय जी, खार मा।
गाँव के हर घर, बबा मुखिया हवय।
तेखरे सेती सबो, सुखिया हवय।
एक दूसर ला सबो, पहिचानथे।
एक दूसर ला, नता ले जानथे।
सब इहाँ दाई बबा, भौजी कका।
फूल दाई अउ ददा, लाखों टका।
सब मया के डोर मा, बँध के रहे।
एक दूसर के दरद, मिल जुल सहे।
देंवता तरसत रथे, आये इहाँ।
हे दया ममता मया, सुमता जिहाँ।
बात गंगा के लगे, जस धार हे।
कोयली कस बोल, अपरम पार हे।
काम माटी के सदा, सेवा करे।
माँ सरीखे पूज, अंतस मा धरे।
छल कपट जानय नही, कोनो इहाँ।
लोग सचमुच हे, बड़ा भोला जिहाँ।
देख लेहू आ, कभू भी गाँव मा।
मिल जही बइठे ग, पीपर छाँव मा।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment