पद्धरी छंद
चल बिहना बेरा जाग जाग।
अब येती ओती भाग भाग।
बिहना ले करले जोग सोग।
नइ आवय तन मन रोग सोग।
मिहनत वाला कर काम धाम।
जपले हरि के तँय राम नाम।
बिहना हर सुग्घर होय तोर।
चल देख सुरुज ला होत भोर।
अब घूम जरा तँय खेत खार।
धनहा ढोली के मेंड़ पार।
अब बइठ तनिक ले धूप सेंक।
तन के ऊर्जा झन देख फेंक।
जे करबे अइसन काम रोज।
तन हिष्ट पुष्ट मन होय सोज।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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