Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल    गाँव
221 1222 221 1222

अब गाँव कहाँ मिलथे,सब ओर शहर हाबे।
कंक्रीट के हे जंगल, तँय जेन डहर जाबे। 

माटी के न भिथिया हे, खपरा के न हे छान्ही।
ढेंकी न मिले कुरिया,जा गाँव म पछताबे।

खलिहान भरे कचरा,कोठा ह परे सुन्ना।
अब भूंख मरे मुसुवा,घर अन्न कहाँ पाबे। 

सब पेंड़ कटा गे हे, तरिया ह पटा गे जी।
भाँठा न मिले खोजे,सब घेर रखे दाबे।

दइहान गवाँ गे हे,घुरुवा न मिले संगी।
कचरा म पटे बखरी,का साग भला खाबे।

पहिचान सिरा गे हे, सब गाँव के सुन भाई।
रख आस कहूँ जाबे,धर काय भला लाबे।

ओ गीत कहाँ बनथे,जे गीत गवइहाँ हो।
अब कोन जहुरिया हे, का गीत मया गाबे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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