गजल गाँव
221 1222 221 1222
अब गाँव कहाँ मिलथे,सब ओर शहर हाबे।
कंक्रीट के हे जंगल, तँय जेन डहर जाबे।
माटी के न भिथिया हे, खपरा के न हे छान्ही।
ढेंकी न मिले कुरिया,जा गाँव म पछताबे।
खलिहान भरे कचरा,कोठा ह परे सुन्ना।
अब भूंख मरे मुसुवा,घर अन्न कहाँ पाबे।
सब पेंड़ कटा गे हे, तरिया ह पटा गे जी।
भाँठा न मिले खोजे,सब घेर रखे दाबे।
दइहान गवाँ गे हे,घुरुवा न मिले संगी।
कचरा म पटे बखरी,का साग भला खाबे।
पहिचान सिरा गे हे, सब गाँव के सुन भाई।
रख आस कहूँ जाबे,धर काय भला लाबे।
ओ गीत कहाँ बनथे,जे गीत गवइहाँ हो।
अब कोन जहुरिया हे, का गीत मया गाबे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment