गजल
2122 1212 22
पेंड़ जबले धरा सिरा गेहे।
देख बादर घलो रिसा गेहे।
आय हावय किसान धर नाँगर।
खेत पथरा सही सुखागेहे।
अब किसानी भला कहाँ होही।
घाम देखे घटा उड़ा गेहे।
हाथ माथा धरे करे चिंता।
रात के दू बजे के जागे हे।
तेल नइ हे दिया म अब साथी।
देख बाती घलो बुझा गे हे।
राख मा कब रहे बता जिनगी।
जेन होथे उही बहा गेहे।
पाँव काँटा गड़े पिराथे जी।
कोन चप्पल धरे भगा गेहे।
ठाँव पाये हवँव बने छइहाँ।
नींद आँखी बने हमा गेहे।
जाग जाबे दिलीप बिहना ले।
काम बूता के दिन ह आ गेहे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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