आनंद वर्धक छंद
मोर मन कहिथे, उड़वँ आगास मा।
जाग जातिस पाँख, मोरो पास मा।
देख आवँव दूर ले, भगवान ला।
जे बनाये हे, असन इनसान ला।
देख के लागे भला, बइमान हे।
सोंचथे नइ जानही, नादान हे।
तोर करनी हर कहाँ, छुपही भला।
एक दिन कटजाय रे, तोरो गला।
दोसती ला तक तहूँ, छोड़े नहीं।
काट दे बइमान, फेंके हस कहीं।
खून मा हे तोर, चालाकी बहुत।
मारबे कतका बता, बाँकी बहुत।
आज बहिनी हर तको, बाँचय नही।
बाप बेटी के नता, बिखरे कहीं।
मान अउ सम्मान, जम्मो धो जथे।
आज रिसता देख ले, सब खो जथे।
बाप ला सीढ़ी समझ, चढ़थे सबो।
बेंच के घर द्वार, कहिथे सँग रबो।
भाग जाथे छोंड़, पा के नौकरी।
या भगाये छोंड़, पाये छोकरी।
देव तँय काबर बनाये, आदमी।
देख ले गोबर सनाये, आदमी।
पाप के रसता चले, नइ मानथे।
तोर हे अस्तित्व, ओ नइ जानथे।
जे उड़ा पावँव, बतावँव हाल ला।
आदमी के दोष, ओखर चाल ला।
भागमानी हँव, जपत हँव नाम जी।
मोर जानत हँव, हवय का काम जी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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