सवाई छंद - दिलीप कुमार वर्मा
बोली बतरस के बानी मा,छत्तीसगढ़ी के रस घोलव।
जब भी आपस मा बतियावव,छत्तीसगढ़ी मा ही बोलव।
छत्तीसगढ़ के रहवासी सुन,छत्तीसगढ़िया दूसर नोहय।
जे छत्तीसगढ़ी बतियाथे, ते समाज मा सुग्घर सोहय।
पढ़बे लिखबे अउ बतियाबे,मान तभे भाखा हर पावय।
सिर्फ कहे बस ले गा संगी,तोला कोनो नइ सहरावय।
जे छत्तीसगढ़ी बतियाइन,ते मन इहचे नाम कमाइन।
भाखा खातिर उदिम करिन हे, अउ सब ला चल के चलवाइन।
रच डारिन हे ग्रन्थ बड़े अउ,गीत तको सुग्घर ओ गाइन।
कविता तक भरमार रचे हे,जा के दुनिया ला सुनवाइन।
जनता नेता अउ अधिकारी,नित बोली मा जब ओ लावय।
काम करय सरकार जभे जी,मान तभे भाखा हर पावय।
शब्द हमर भाखा के भाई,देखव संगी झन बिसरावय।
सब के देखा देखी देखव,अँगरेजी हर झन छा जावय।
सरम करव झन बोले खातिर,कहत हवँव तेला सच मानव।
जइसन घर के हे महतारी,तइसन भाखा ला तक जानव।
छत्तीसगढ़िया के चिनहारी, माथा मा कोनो नइ पावय।
छत्तीसगढ़ी जब ओ बोलय, तब जानय अउ सबझन भावय।
छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया, अइसन जी कोनो नइ काहय।
सब ले सिधवा गुरतुर भाखा,जब सब के जी अंतस राहय।
रचना कार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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