Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल 
221 2122 221 2122

कागज कलम उठा के, लिख दे बबा ल पाती।
आजाय घर म राहय, अपनो जुड़ाय छाती।

दारू पिए के खातिर, झगरा मताय घर मा। 
करथे बड़ा बहाना,नइ दय बहू चपाती।

हलवा दबा के खाथे, ठंडा कभू न भावय। 
माँगत रहे हमेसा, दिन होय चाहे राती।

पुरखा अपन गिनाथे, राहय कतेक मंडल।
अबतो गुजर चलत हे, बाँचे इहाँ न बाती।

चलथे मुड़ी उठाये, जइसे रहे ओ राजा।
बाँटत रहे खजाना,रसता म आती जाती। 

कइसे दिलीप काहय, झन शान अब दिखा गो।
दारू ल छोड़ दे तँय,बिगड़त हवय ग नाती।

दिलीप कुमार वर्मा
23-7-2019

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