गजल
221 2122 221 2122
कागज कलम उठा के, लिख दे बबा ल पाती।
आजाय घर म राहय, अपनो जुड़ाय छाती।
दारू पिए के खातिर, झगरा मताय घर मा।
करथे बड़ा बहाना,नइ दय बहू चपाती।
हलवा दबा के खाथे, ठंडा कभू न भावय।
माँगत रहे हमेसा, दिन होय चाहे राती।
पुरखा अपन गिनाथे, राहय कतेक मंडल।
अबतो गुजर चलत हे, बाँचे इहाँ न बाती।
चलथे मुड़ी उठाये, जइसे रहे ओ राजा।
बाँटत रहे खजाना,रसता म आती जाती।
कइसे दिलीप काहय, झन शान अब दिखा गो।
दारू ल छोड़ दे तँय,बिगड़त हवय ग नाती।
दिलीप कुमार वर्मा
23-7-2019
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