श्रृंगार छंद
सुनावँव आँखों देखा हाल।
गाल हर होगे हावय लाल।
तान के थपरा देइस चार।
खाय हे टूरा हर जी मार।
टुरी के पाछू पाछू जाय।
कोहनी मा तक ओ धकियाय।
दिखावत राहय चल के चाल।
बनाये कुकरा जइसे बाल।
पहिर के चश्मा ओ इतराय।
टुरी ला आगू ले अँखियाय।
टुरी नइ देवत राहय ध्यान।
लाज के राखय हर पल मान।
मुड़ी तक पानी हा चढ़जाय।
छेड़ना टूरा के बढ़जाय।
टुरी के पारा हो बिकराल।
खींच के मारिस थपरा गाल।
धरे ओ चुन्दी ला चुंदियाय।
लात घूँसा मा देत ठठाय।
होत हे चारो कोती शोर।
मार कह देवत जम्मो जोर।
हौसला सब्बोझन के पाय।
निकाले चप्पल मा झपड़ाय।
मार के करदिस बारा हाल।
गाल टूरा के होगे लाल।
पाय हे करनी के अंजाम।
करे ओ गलत रहय जी काम।
जही ओ आगू ले जी चेत।
करम फल जब लड़की मन देत।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment