गजल
2122 12 12 22
देख माटी नमी ल खोये हे।
दुःख भारी किसान ढोये हे।
धान पाबो बने यहू बारी
आस भारी सबो सँजोये हे।
देख के दुख किसान के भारी।
देव बरसा तुरत पठोये हे।
टोर जाँगर किसान हा बोवय।
धान भाँठा रखे सरोये हे।
चोर चोरी करे भगा जाथे।
कोन छेंकय सबो तो सोये हे।
आम कइसे मिले बता संगी।
जेन अँगना बबूल बोये हे।
मार देथे बने रहे हीरो।
हाथ आथे तहाँ ले रोये हे।
ओ मसीहा बने हवय भाई।
पाप के दाग सब ल धोये हे।
मान लेवव दिलीप के कहना।
घाम चुंदी कहाँ पकोये हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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