Friday, 7 February 2020

पद्धरी छंद

पद्धरि छंद 

सुन्ना बेरा ओ देख झाँक। 
तारा ला टोरय ठोंक ठाँक। 

रतिहा के बेरा आय चोर। 
चुपके आवय नइ होय शोर। 

धरके गहना ओ भाग जाय। 
पइसा कौड़ी तक नइ बँचाय। 

करथे मनखे बस हाय हाय। 
लेगे चोट्टा सब जे कमाय। 

गहना गुरिया सब ले भगाय।  
छाती पीटे जस जान जाय। 

थाना मा जाके सब बताय। 
उहँचो तक करथे हाय हाय। 

पर उहँचो कुछ भी हो न पाय। 
चोरी जे होगे फिर न आय। 

ता राखव भइया सब सँभाल। 
नइ ते सब के ये होय हाल। 

दिलीप कुमार वर्मा




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