Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल

आज अंतस ले महूँ मुसकाय हँव।
एक घर अपनो इहाँ बनवाय हँव।

मोर घर ला देख के झन जल सखा।
बैंक वाला ले उधारी पाय हँव।

एक पाई तक बचे नइ हे इहाँ।
कर्ज मा पूरा नरी तक आय हँव।

काम अबड़े बाँच गे हावय अभी।
पाँव चादर ले बड़े फइलाय हँव।

आमदानी हे अठन्नी मोर जी।
रोज रुपिया खर्च कर पछताय हँव।

लोग सोंचत हे बड़ा धनवान हे।
मँय भिखारी ले घलो पिछवाय हँव। 

पेट काटत किश्त ला देहूँ दिलीप।
तब कहूँ मँय आज घर ला पाय हँव।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

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