गजल
मँय घटा करिया के होवत शोर औं।
चुप कराले दे मया मँय तोर औं।
तोर घर के देहरी मा हे कुकुर।
भूँक थे ता लागथे मँय चोर औं।
पा मया हरिया जहूँ कहिके कहे।
तँय बता का मँय खनाये बोर औं।
डूब के रइहूँ कहे तँय मोर ले।
तँय बता का साग के मँय झोर औं?
जब घटा आथे निटोरत रहि जथस।
नाच के दिखला कहे ,का मोर औं?
बाँध के रखबे कहे परिवार ला।
का समझथस ,मँय ह कोनो डोर औं?
नाम मोरो हे बतावत हँव दिलीप।
तँय हुदर के बोलथस ,का ढोर औं?
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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