सहभागिता
मानव कुल में जन्म लिए तो,मानव बनकर दिखलाएँ।
रहें अकेले नही कभी हम ,साथ सभी के आ जाएँ।
काम करें सहभागी बन कर,पथ आसान बनाएंगे।
कितनो ही मुश्किल आ जाये,फिर भी मंजिल पाएंगे।
दूर हटा सकते कुरूतियाँ, बन समाज सहभागी हम।
विजय पताका फहरा सकते,अगर खेल दिखलाएँ दम।
ऊंच नीच की भेद भाव को,मिलकर चलो मिटाना है।
जो समरसता पर हैं चलते,साथ उसी के जाना है।
हम सहभागी गर बन जाएं,स्वच्छ समाज बनाने को।
कोई रोड़ा रोक सके ना,मंजिल अपनी पाने को।
देश और परिवेश हमारा,हम ही इसके वासी हैं।
साफ स्वच्छ गर रख पाएँ तो,ये ही काबा काशी है।
सबकी सहभागिता रहे तो,देश स्वर्ग बनजाएगा।
काम करें सब मिलजुल अपनी, फिर विपदा ना आएगा।
आजादी पाने की खातिर,सहभागी बन सब आए।
जिससे जितना बन पाया था,उतना देकर ही लाए।
मूल मंत्र है इस जीवन का,गर खुशहाली लाना है।
बन सहभागी सभी क्षेत्र में,अपना फर्ज निभाना है।
जब समाज के हर वर्गों से,सहभागी बनकर आते।
तब समरसता की ओ धारा, गंगा जल पावन लाते।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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