गजल
एक दिन आही महू ला आस हे।
हार नइ मानँव जहाँ तक साँस हे।
बालटी ला डार के तीरत हवँव।
बून्द तक हा मोर बर तो खास हे।
छोंड़ के कइसे भला जावँव बता।
मोर माटी मोर तन के पास हे।
राह जोहत हँव उहू आही इहाँ।
ओखरो तो नइ बुझाये प्यास हे।
पेंड़ के पंछी उड़े आकाश मा।
लौट के आही इहें बिसवास हे।
पेंड़ के पाना सहीं झरगे सबो।
मोर हाड़ा रेंगथे जस लास हे
देख आवत हे अभी करिया दिलीप।
सोर होवत हे बरसही आस हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
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