बराती
बराती बनके घर मा आय।
देखलव कइसन उधम मचाय।
पिये हे दारू ला मुह बोर।
डगर मा शीशी देइस फोर।
लान के डीजे बहुत बजाय।
नाच के हल्ला बहुत मचाय।
करत हे धक्का मुक्की पोठ।
हवँय मुस्टंडा भारी मोठ।
लड़े बर हावँय ओ तइयार।
कनो ला दीही लगथे मार।
सियनहा मन तक सब तिरियाय।
लड़ाई कोनो हर नइ भाय।
बाढ़गे हावय देखव शोर।
शराबी भिड़ गे दू झन खोर।
नशा के बाढ़े हावय जोर।
लड़त हे जइसे लड़ते ढोर।
बराती दरुहा ला दय छोड़।
जाय दुलहन ले नाता जोड़।
घराती मन जम्मो खिसियाय।
धरे दूल्हा ला घर ले आय।
करादय फेरा ओ झट सात।
खवादय तुरते ताही भात।
बिदाई के बेला तक आय।
बिहा अब अइसन ही हो पाय।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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