श्रृंगार छंद
देव दानव के होथे मेल।
करे हे जेमन भारी खेल।
मथे सागर ला मिलके जान।
करे ओ पूरा हे अरमान।
मथानी बनगे हवय पहाड़।
बीच सागर मा देइस गाड़।
बड़े रस्सी के राहय चाह।
वासुकी नाग निकालिस राह।
देवता पुछी डहर तिरियाय।
खड़े दानव मुँह कोती जाय।
खींच थे आगू पाछू डोर।
लगावत हावय दूनो जोर।
हाल नइ पावत हवय पहाड़।
लगे खूँटा कस देहे गाड़।
रूप कछुवा के धर भगवान।
भार पर्वत के धर लिस जान।
मथानी चले लगिस दिनरात।
मिलत हे धीरे से सौगात।
जहर हर निकलिस पहिली जान।
नाथ शिव भोला करलिस पान।
दिलीप कुमार वर्मा
No comments:
Post a Comment