ताटक छंद
खरा भरोसे पर उतरा वो, जिसको लोगों ने छोड़ा।
मेरे अंदर भी दुविधा थी,रहा भरोसा भी थोड़ा।
जिसपे उँगली सदा उठी हो,कहाँ भरोसा होता है।
सहीं काम करके दिखलाए,फिर भी अंतस रोता है।
आज जमाना ऐसा है की, नही भरोसा कर पाते।
जिसको रक्षक समझ रहे हैं,हाथ उसी के लुट जाते।
जिसको हमने अब तक चाहा, वो ही आज पराया है।
रहा नही विश्वास जरा भी, संग नही अब साया है।
किसपर दोष मढेंगे बोलो,अपनों ने ठुकराया है।
संगी साथी छोड़ चले हैं, संग रहा बस काया है।
पर कुछ ऐसे भी हैं जग में,जो विश्वास जगाते है।
काम अनूठा कर दिखलाते,मान सभी का पाते हैं।
थोड़ा सा उत्साहित कर दो,सब करके दिखलाएगा।
रखो भरोसा इन लोगों पर,नया सवेरा लाएगा।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment