Friday, 7 February 2020

दोहे

दोहे 

सब की अपनी धूप है,सब की अपनी छाँव। 
सबसे सुंदर है मगर, अपना अपना गाँव।1। 

कोई बैठा धूप में, गली जोर की ठंड। 
कोई आगी ताप कर, तन को देता दंड। 

कम्बल कोई ओढ़ कर, सोया है चुप चाप। 
तब भी तन है काँपता, ठंडी सब का बाप। 

खिड़की सारे बंद हो, बंद रहे सब द्वार। 
फिर भी आती है हवा, ठंडी में क्यों यार। 

पानी को छूना नही, कहते सारे लोग। 
जम जाएगा खून भी, लग जाएगा रोग। 

सन सन चलती है हवा, दिन जाड़ा जब आय। 
कमरे के अंदर रहो, फिर भी तन ठिठुराय। 

ठंडी का यह दिन सखा, ऊपर से बरसात। 
दंड प्रकृति का है यही, बता रही अवकात। 

धुंध सड़क पर घोर है, दिखे ओर ना छोर। 
चलना मुश्किल हो रहा, करलो जितना जोर। 

समय समय पर ओ सदा, दिखलाता अस्तित्व।  
पर मानव समझे रही, रहता बड़ा पतित्व।

गर्मी में जलते सभी, लग जाता है आग। 
मचता हाहाकार है, कहता मानव जाग। 

बरसा में बिकराल हो, आता नदी उफान। 
ले जाता सबको बहा, आफत रहती जान।  

आता है भूचाल भी, धरती तब हिल जाय।  
बनता कहीं पहाड़ तो, कहीं रसातल जाय। 

सागर में लहरा उठे, निगल जाय सब गाँव। 
अस्त ब्यस्त जीवन रहे, मिले कहाँ फिर ठाँव। 

और भला क्या चाहिए, बोलो तुम्हे प्रमाण। 
दिखा रहा अस्तित्व है, प्रभु के हैं ये बाण। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार 


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