गोपी छंद
कहाँ ले आये रे बदरा।
अबड़ तँय गे हावच भदरा।
गिरा झन देबे तँय पानी।
टूट गे हावय जी छानी।
धान सब मंडी माढ़े हे।
गहूँ के खेती ठाढ़े हे।
चना तिवरा के हे खेती।
परे इल्ली होही रेती।
कोहरा अबड़े छाये हे।
ठण्ड मा बरसा आये हे।
कँपावत हे जमके हाड़ा।
बाढ़गे हावय जी जाड़ा।
सुरुज हर कहाँ लुकागे हे।
देख जाड़ा ला भागे हे।
माघ पुन्नी के का होही।
नहइया मनखे तक रोही।
रही सब मेला मन सुन्ना।
नहाये नदिया तक उन्ना।
सगा पहुना तक नइ आवय।
सफर जाड़ा के नइ भावय।
भाग अब बदरा तँय जाबे।
लगे सावन मा तँय आबे।
फगुनवा होरी अब आही।
रंग सब धरती मा छाही।
दिलीप कुमार वर्मा
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