गजल
221 1222 221 1222
तँय मोर गली आके,कुछ आस जगा देते।
मझधार फँसे डोंगा,तँय पार लगा देते।
संसार म कतको हे, पर तोर असन नइ हे।
जे भाग लिखे करिया, ते भाग भगा देते।
ओ बार बुझा दे हे,कुछ शेष कहाँ पाबे।
बस राख बचे हावय,तँय आग दगा देते।
बरसात म बरसा हा, बढ़िया ले बरस जाही।
बस एक बने रुखुवा, तँय आज लगा देते।
दिलीप कुमार वर्मा
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