Wednesday, 26 February 2020

गजल

गजल
221 1222 221 1222 
तँय मोर गली आके,कुछ आस जगा देते।
मझधार फँसे डोंगा,तँय पार लगा देते। 

संसार म कतको हे, पर तोर असन नइ हे।
जे भाग लिखे करिया, ते भाग भगा देते।

ओ बार बुझा दे हे,कुछ शेष कहाँ पाबे।
बस राख बचे हावय,तँय आग दगा देते।

बरसात म बरसा हा, बढ़िया ले बरस जाही। 
बस एक बने रुखुवा, तँय आज लगा देते।

दिलीप कुमार वर्मा

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