Saturday, 31 October 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212 2212 2212 2212 

लागत हवय फिर आय हे चारो डहर बड़ शोर हे। 
चल देखथौं जा के उहाँ ये साल काखर जोर हे।

तँय थोथना ला बोर के खा ले नरी के आत ले। 
पर नइ अघावस तँय कभू  लालच भरे मन तोर हे।  

कतको बता मानय नही करथे अपन मन के सदा। 
खींचत रथे हर बात ला सच जान निच्चट ढोर हे।

राँधे रहे हँव बोकरा खाहूँ बने दमकाय के। 
खा दिस बिलइया हर सबो  बाँचे तको नइ झोर हे।

बाढ़त करोना हे बहुत वैक्सीन बन नइ पाय हे।
लगथे मचाही रार ये छतिया ह धड़कत मोर हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Friday, 30 October 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212 2212 2212 2212 

बइला अघावत नइ हवय भूसा तनिक तँय डार दे। 
पाचन बढ़ाये बर कका तँय नून छीटा मार दे। 

धुँगिया बनत हावय बहुत आँखी तको करुवात हे। 
थोरिक छिड़क के तेल आगी ला बने तँय बार दे। 

लाँघन मरत हावय बहुत बिन काम के कतको इहाँ। 
हर हाथ खातिर खोल के कुछ काम अब सरकार दे। 

करके सियानी तँय बहुत पइसा कमाये हस कका। 
देखत हवस तँय हाल ला थोरिक तहूँ चतवार दे।

दाई गुहारत हन सबो आये हवन हम द्वार मा। 
बन काल कोरोना बढ़े तँय आय विपदा टार दे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212 2212 2212 2212

माटी बने काया हवय झन कर गरब पहिचान ले।  
सब एक दिन माटी मिले काहत हवँव सच मान ले। 

राजा मरे रानी मरे मरथे प्रजा बाँचय नही। 
फिर का फिकर करबे कका तँय का हरस सच जान ले। 

कखरो कहे ला मान के झन कर कका तँय काम जी। 
अपनो समझ मा सोंच ले का हे सही तँय छान ले।  

रहना हवय सुख चैन से झन कर बुराई काखरो। 
परही छड़ी नइ ते कभू रहते समय मन ठान ले।

बरसात गरमी जाड़ ले तोला बचाही हर समय। 
नइ हे महल घर द्वार ता एकात छपरी तान ले।

घर भूत के डेरा लगे बगरे हवय सामान हर। 
करही जतन घर के बने बाई बिहा घर लान ले। 

रखबे कभू झन चाह ज्यादा हो जथे गड़बड़ सगा।
रइही अधूरा आस ता आबे लहुट समशान ले। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Thursday, 29 October 2020

बाल कविता

बाल कविता 

दादा जी की छड़ी निराली, काम बहुत है आये।
दादी को शौतन सी लगती, पर दादा को भाये।  

दादा जी का बना सहारा, सैर कराने जाते। 
कुत्ता भौंके अगर राह में, उसको मार भगाते।  

गइया को भी हाँक भगाते, बंदर को चमकाते। 
अगर पेंड़ अमरूद मिला तो, झटपट मार गिराते। 

नीम पेंड़ हो या बबूल की, दातुन तोड़ दिखाए।
सुबह-सुबह पूजा करने को, फूल तोड़ ले आए।  

छड़ी बनू मैं दादा जी की, पल-पल साथ निभाऊँ। 
जितना सम्भव हो मझसे वो, सारे कर दिखलाऊँ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



बाल कविता

बाल कविता 

मेरे घर हाथी गर होता, बैठ सैर को जाता। 
पक्के-पक्के आम तोड़ कर, बैठ मजे से खाता। 

कुत्ता भौंके जो पीछे से, पर मैं ना घबराता। 
बड़े चैन से ऊपर बैठे, ताली खूब बजाता। 

मेरे आगे सारे बच्चे, बौने से हो जाते। 
हमे बिठालो ऊपर कह के, मेवा मिश्री लाते। 

पर मैं हाथी ऊपर बैठे, गर्दन जरा हिलाता। 
जग नही है ऊपर कह के, सब को बहुत चिढाता।

नदी रहे या जंगल झाड़ी, सब को पार लगाता। 
सैर सपाटा करता दिन भर, साँझ ढले घर आता।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 27 October 2020

बाल कविता

बाल कविता 

मेरे पापा मुझे बताओ। 
दिन कैसे होता समझाओ? 

सूरज क्यों जलते रहता है?
दिनभर क्यों चलते रहता है?

साँझ ढले पश्चिम में जाता। 
सुबह पूर्व में कैसे आता?

पश्चिम से उसको आना था। 
पूर्व दिशा में ढल जाना था। 

क्या वो आग बुझा आता है? 
पूरब में फिर जल जाता है। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22   

मोर अँगना म सगा आये हे। 
कोन टूरी ल भगा लाये हे। 

देख थे खोर ला घेरी बेरी। 
का जनी कोन ल घबराये हे। 

कब के लाँघन हवे पहुना मोरो।
घेंच के आत ले वो खाये हे। 

टूरा हावय भले बिटबिट करिया। 
टूरी ला चाँद असन पाये हे। 

एक दिन घर म पुलिस आ धमके। 
देख मोला बड़ा धमकाये हे। 

का जनी काय करे हँव गलती।
सोच के मन बड़ा पछताये हे। 

जेन अपराध करे पकड़ा थे।
जेल मा जाय के लुलवाये हे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




Friday, 23 October 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22   

मोर अँगना म सगा आये हे। 
कोन टूरी ल भगा लाये हे। 

देख थे खोर ला घेरी बेरी। 
का जनी कोन ल घबराये हे। 

कब के लाँघन हवे पहुना मोरो।
घेंच के आत ले वो खाये हे। 

टूरा हावय भले बिटबिट करिया। 
टूरी ला चाँद असन पाये हे। 

एक दिन घर म पुलिस आ धमके। 
देख मोला बड़ा धमकाये हे। 

का जनी काय करे हँव गलती।
सोच के मन बड़ा पछताये हे। 

जेन अपराध करे पकड़ा थे।
जेल मा जाय के लुलवाये हे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22   

पूछ झन मँय ह अभी हँव कइसे। 
बात हे झूठ बता दँव कइसे।

सोन के भाव बढ़े हे भारी। 
मँय अँगूठी बता अब लँव कइसे।

आज खर्चा बिहा के बाढ़े हे।। 
ज्यादा पइसा ल बटोरँव कइसे। 

मोर दामाद निचट दरुहा हे।
मोर बेटी ल पठोवँव कइसे। 

सास घर आय लड़ावत हावय।
ये मुसीबत ले मे बाचँव कइसे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22   

कोटना मा भरे पानी रखबे। 
बाँध के तोर जवानी रखबे। 

काम आही समे निपटाये मा।
सुरता सब तोर कहानी रखबे। 

पूछ सकथे करे का तँय अब तक।
याद सब बात जुबानी रखबे। 

देख झन फूट जवय पानी मा। 
छाय सुग्घर ते पलानी रखबे। 

जाने कब सार निकाले पड़ जय।
संग अपनो ते मथानी रखबे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


Thursday, 22 October 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22             

कोन मछरी गरी मा आही जी। 
जेन चारा भरे मुँह खाही जी। 

रात के बार दिया ला रखबे। 
नइ ते पति तोर ओ घबराही जी।  

मान जा बात बिहा करवा ले।
बाद मा ये टुरा अटियाही जी।

जा के जल्दी ते लहुट आ जाबे।
नइ ते दूसर ल ओ छुछवाही जी। 

रोस मा ओ कहे तोला होही।
सोंच के बाद म पछताही जी। 

बात बिगड़े त बना सुमता ले।
नइ ते लाठी ह बरस जाही जी।

जेन बादर ह गरज थे भारी। 
सोच झन ओ कभू बरसाही जी। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22             

सोज रसता म चले आ जाबे। 
बइठे रइहूँ ते उहाँ पा जाबे। 

जेन भावय नही  फूटे आँखी।
छोड़ अइसन के इहाँ का जाबे। 

घाम मा मोर कहूँ तन जरही।
बन के बादर बही तँय छा जाबे। 

लाल लुगरा फबे तोला गोरी।  
रेंगबे राह गजब ढा जाबे।

चेहरा लाल बहुत होवत हे।
तोर गुस्सा ले लगे खा जाबे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Tuesday, 20 October 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22                 

सोज रसता म चले आ जाबे। 
देख के साँझ ढले आ जाबे।  

कोयली कूक अभी पारत हे। 
जइसे ही आम फले आ जाबे।  

तोर रसता ल निहारत रइहँव।
रात के दीप जले आ जाबे।   

घाम के बेर कहूँ आना हो।
आम के छाँव तले आ जाबे। 

मोर हालत म दया झन करबे।
छाती मा मूंग दले आ जाबे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Monday, 19 October 2020

बाल कविता

बाल कविता 

रात अकेले डर लगता है। 
तन सोता आँखें जगता है। 

होती आहट घबराता हूँ। 
चादर अंदर छुप जाता हूँ। 

हवा चले जब सर-सर सर-सर। 
काँपे जिवरा थर-थर थर-थर। 

उल्लू बोले बैठ अटारी। 
फिर हालत बिगड़े हैं भारी। 

मन कहता आवाज लगाऊँ। 
हो कोई तो पास बुलाऊँ। 

पर मुख से आवाज न आये। 
डर से पूरा तन थर्राये।  

फिर दरवाजे आहट आई। 
मम्मी आकर मुझे जगाई।

अब क्या मैं हालात बताऊँ। 
कैसी बीती रात बताऊँ। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

Sunday, 18 October 2020

घनाक्षरी

घनाक्षरी

ददा ह रिसाय हावे,मुँह ला फुलाय हावे,
दाई तक बोले नही,बड़ा जंजाल हे।
बाई घर आये हावे,झगरा मताये हावे,
बिहा करना ह भाई,होगे जी के काल हे।
बाई कोती बोलबे त,दाई ह रिसाय जाथे,
दाई कोती बोलबे त,बाई लाल लाल हे। 
घर के न घाट के हौं, मैं तो पुक लात के हौं
धोबी के कुकुर जस,मोर होय हाल हे।

गरज गरज जब,बदरा बरस जाथे,
तरस तरस जीव,तक हरसाय जी।
मगन मगन मन,छमक छमक छम,
थिरक थिरक कर,नाच के दिखाय जी।
डगर डगर हर,महक महक उठे,
चहक चहक कर,तन बतियाय जी।
खेत खार झूमे लागे,पग पग चूमे लागे,
हवा बउराय चले,खुशी जग छाय जी।

बेटी न बताय हावे,कहाँ ओ भगाये हावे,
जिया घबराय हावे,ददा परेसान हे।
दाई ह बिलख रोवे, दिन रात ओ न सोवे,
हाय हाय करे दाई,बेटी म परान हे ।
काय ये जमाना आये,जेला देख ते भगाये,
मान मरियादा के जी,कहाँ ओला भान हे । 
जात पात ओ न देखे,भला बुरा ना सरेखे,
काम ये कराये बैरी,मया बेईमान हे। 

घर सुना सुना लागे,जब ले बेटी भगा गे,
दाई रात रात जागे, जाने कब आय जी।
खेल ओ खिलौना रोवै, कुरिया ह मान खोवै,
खटिया उतान सोवै, कोनो नइ भाय जी।
बात कछु ओ न कहे,संग संग जिन रहे,
सबो हे उदास आज,मुँह ला फुलाय जी।
माना बेटी सगा होथे,बिदा बेरा सबो  रोथे,
पर जे भगाय बेटी,सबो खिसियाय जी।

महर-महर घर,अँगना महक उठे,
कहर-कहर खेत,खार ममहाय जी।
कुहुक-कुहुक जब,कोयली कुहुक पारे
तब जान लेवा मौर, अमुवा म छाय जी।   
सरर-सरर सर, हवा ह चलन लागे,
हरर-हरर के गा, दिन हर आय जी।
चरर-चरर चर,चर-चर-चर बाजे,
पतझड़ होय रहे, पाना चर्राय जी।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

जनउला

जनउला 

फसल बने लहरात हे, पर नोहय ये खेत। 
सुनके बाजा अउ बढ़े,करे किसनहा चेत। 
जेवारा 

पाँव जमाये ओ खड़े,हाथ रखे छतराय। 
जे जावय ओ तीर मा,सरग सही सुख पाय। 
पेंड़ 

बिन बोले बतलात हे, कोन करे का काम। 
चाहत हव ता जान लव,तीन रुपइया दाम। 
अखबार

सूते लंगर डार के,काम करे नइ जाय। 
मिहनत कस माँगे इहाँ,जम्मो देत लुटाय। 
खेत 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

जनउला

जनउला  

1
बरसा के दिन मा बने,गरमी मा उड़जाय। 
मटक मटक झन रेंगबे,देही तुरत गिराय। 

2
बिन के लाने फूल ला,मरकी मा दे बोर। 
भाप बना पी देख ले,होस उड़ाही तोर। 

3
देखे मा चिरई हरे, जादा नइ उड़ियाय।। 
होत बिहानी जाग के,सब ला इही जगाय। 

4
करिया बेनी कस रहे,मिले ओर ना छोर। 
पक्का चुंदी संग मा,जइसे लामे डोर। 

5
बिहना लालम लाल हे, संझा लालम लाल। 
दिनभर नीला ओ दिखे, रतिहा लागय काल। 

6
नारी मन जुरियाय हे, ओखर चारो अंग। 
झूल झूल खींचत हवय, जइसे माते जंग। 

उत्तर:-1चिखला  2 मउहा 3 कुकरा 4 सड़क 5 आसमान 6 कुँआ 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

गजल

गजल 

221 2122 221 2122 

ससुराल गे रहँव जी,बिहना ले मँय ह काली। 
धर हाथ ला भगा गे, सँग मोर ,मोर साली।

कुकरा बनाय देशी,बढ़िया डले मसाला। 
बस नून के कमी ले,पटके बबा ह थाली। 

झिल्ली बनाय काबर,सरकार अब बतादे। 
पानी निकल न पावय,सब जाम होय नाली। 

बरसात के महीना,नइ हे पता घटा के। 
नदिया तको सुखाये, बाँधा परे हे खाली। 

कोनो जगा हे सूखा, हे बाढ़ तक कहूँ गा।
मरना हवय सबो ला,भगवान खेले जाली। 

अबतो दिलीप तोरो, नइ तो हवय ठिकाना। 
रुखुवा सबो कटागे,बाँचे न एक डाली। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

24-7-2019

सार छंद

माटी के घर

रहिस बने माटी के कुरिया,जाड़ लगे ना गरमी। 
खपरा ऊपर रहे छवाये,निशदिन लागे नरमी। 

कुरिया ऊपर रहे पठउँहा,जे घर ला दँदकावय। 
जाड़ा मा गरमी ओ लावय,गरमी तक मा भावय। 

अँगना परछी बरवट जम्मो, खुल्ला-खुल्ला राहय। 
हवा घाम छन-छन के आवय, मन उड़ियावन चाहय।

अँगना मा दरमी के बिरवा, अउ तुलसी के चौरा। 
गौरैया दिनभर नरियावय,लइका खेलय भौरा। 

रतिहा कन चंदा घर आवय, अँगना ला उजरावय। 
लाख चँदैनी आसमान ले, अपन हँसी बगरावय। 

खटिया अँगना बीच जठाये, खुसी खुसी सुत जावन। 
होत बिहानी चिंव चिंव सुन के,अँगना लागे पावन। 

बरसा के दिन देख घटा ला, मन अबड़े हरसावय। 
रदरद रदरद बरखा रानी, सीधा अँगना आवय। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

जनउला

जनउला 

1
घर के चौकीदार बन,खड़े रहे दिनरात। 
बिन सरके खुसरे नही,मनखे आवत जात। 
कपाट  

2
सोना पर सोना नहीं,रहे सोन कस रंग। 
चाँदी भीतर मा भरे,तेखर बर हो जंग। 
धान 

3
सूजी धर डॉक्टर चले,देख सबो घबराय। 
जेला भी ओ टोंच दय,तन आगी बर जाय। 
बिच्छू  
4

रहिथे तरिया बीच मा,जइसे थारी काँस। 
पानी हर लोटय नहीं,नार गड़े जस फाँस। 
पुरइन पाना 

5
चितकबरी कस तन रहे,माँस खून हे लाल। 
लइका करिया होय जी, लागय स्वाद कमाल। 
कलिंदर 

6
कतको येला रोक ले,पर ये रुक नइ पाय। 
रसता अपन बनाय के,जोही सँग मिल जाय। 

जोही सँग मिल जाय, गीत रसता भर गावय।
पर जब ये गुसियाय, जान फिर आफत लावय।
सब ला सँग ले जाय,राह मिल जावय जतको।  
जेमन भी टकराय,समा गे येमा कतको। 
नदिया

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदा बाज़ार

आल्हा

आल्हा छंद 

हमर देश के बीर सिपाही,जान लुटा के आन बचाय। 
बैरी थरथर थरथर काँपय,एक बार जे आगू आय। 

गन गोला हथियार धरे हे, अउ धर रक्खे हवय कटार। 
कफ़न बँधाये रहिथे हरपल,लड़े मरे बर हे तइयार। 

भीमसेन कस भुजा फरकथे,बम लागे जस गदा प्रहार। 
छर्री दर्री बैरी होजय,एक बार जे करदय वार। 

गन ले गोली अइसे निकले,जइसे अर्जुन के हे बाण। 
लक्ष्य भेद ओ करके रहिथे,नइ बाँचय बैरी के प्राण। 

चमचम चमचम चमकावत हे, जस सहदेव नकुल तलवार। 
तइसे रण मा वीर सिपाही,बिजुरी जस दे मार कटार। 

बड़ा प्रतापी बड़ बल साली ,भारत के सेना ला जान। 
गरजत घुमड़त घटा बरोबर,बैरी बर हे काल समान। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दुमदार दोहे

दुमदार दोहे 

काँव काँव कउवा करे,बइठ अटारी मोर। 
लगथे पहुना आय घर,तभे करत हे शोर। 
बरा बर दार फिलोहूँ। 
नही ते रोटी पोहूँ। 

भाँव भाँव भूँकत हवय,कुकुर गली मा आज। 
लगथे चोर हमाय गे,अपन करे बर काज। 
धरे लाठी मँय जाहूँ। 
चोर ला खूब ठठाहूँ। 

म्याऊँ म्याऊँ बोल के,घर मा खुसरत आय। 
दूध दही ला देख के,तुरते चट करजाय। 
कहाँ मुसुवा ओ पाथे। 
बिलाई बड़ा सताथे। 

जब ले जंगल काट के,कर दिन हे वीरान। 
तब ले देखव बेंदरा,करे अबड़ परसान। 
घरो घर रार मचाथे। 
साग भाजी ला खाथे। 

भर्री भाँठा छेंक के,धनहा सबो बनाय। 
गरुवा चारा बर सखा,बता कहाँ अब जाय। 
खेत भर घूमय खावय। 
सड़क मा रात बितावय। 

शेर मार के खाल ला, बेंचय ऊँचा दाम। 
हाथी दाँत निकाल के,अपन बनावय काम। 
कहाँ जंगल मा राजा। 
बने मनखे के खाजा। 

उत्पादन के मोह मा, खातू देत ढकेल। 
कीरा मारे के दवा,डारत हावय पेल। 
अन्न मा जहर ह भरगे। 
चिरइया मन सब मरगे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

दुमदार दोहे

दुमदार दोहे। 

जश्न मनाते जीत का,महफ़िल मिले हजार। 
जश्न मनाए हार कर,वो जीते हरबार। 
गमो को जो सीते हैं। 
असल में वो जीते हैं। 

हार जीत के खेल में,कभी गए जो हार। 
मत होना मायूस तुम,रखना सबल विचार। 
यहाँ जो लड़ना जाने। 
उसी को दुनिया माने। 

विजय पताका थाम के,राह नही आसान। 
पथ में काँटे भी मिले,जा सकती है जान।  
सम्भल के कदम बढ़ाना। 
पड़े ना जी पछताना। 

जीत वही सकता यहाँ, जो नित करे प्रयास।
हार कभी होता नही,जो रखते विश्वास।
कर्म पथ आगे बढ़ते।
समस्यावों से लड़ते।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

अमृत ध्वनि छंद

अमृत ध्वनि छंद 

मन से सबकुछ हार कर,जीत सका है कौन। 
लगता अथक शरीर भी,हो जाता है मौन। 

हो जाता है,मौन सोंच भी,जड़ तन होता। 
वीराने में,बैठ अकेला,केवल रोता। 
चाहत है गर,लड़ने की तो,हार न तन से। 
जीत सका वो , हारी बाजी, चंगे मन से। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा

चौपई छंद

चाँउर के पकवान (जयकारी छंद)14-11-19

चाँउर के बनथे पकवान,आज बतावत हँव तँय जान। 
कहना ला सिरतो तँय मान, चाँउर के फर होथे धान। 

चाँउर ले जी भात बनाव,बासी बोर गटा गट खाव। 
दूध डार के खीर पकाव,या तसमइ के मजा उड़ाव। 

भात बचे ता बने बघार,जीरा फोरन के तँय डार। 
या अंगाकर रोटी मार,नहि ते भात बरी ला गार। 

चाँउर के जी पीस पिसान,चौसेला चिक्कट हे जान।
दूध फरा सुग्घर ले छान,या पतला पापड़ जस पान। 

पातर पातर फरा बनाव,मोठ मोठ मुठिया ला खाव। 
चीला बनथे धीमा ताव,चटनी सँग खा ले के चाव। 

चाँउर ले पोहा बन जाय,नोनी बाबू अबड़े खाय। 
मिच्चर तक मा रहे मिलाय, मुर्रा लाडू सुग्घर भाय। 

अँइठे अँइठे मुरकू जान,झटपट बनत हवय पकवान। 
कुर्रम कुर्रम सबझन खान,लइका पन मा मजा उड़ान। 

लाई के चमकत हे भाग,बने ओखरा दे के पाग।
मेला मा सुनले तँय राग,पोंगा कहिथे अब तो जाग। 

खलबत्ता मा चाँउर कूट,थोक थोक जावय जी टूट। 
चपके मा जब जाही जूट,मजा अइरसा के तँय लूट। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सार छंद

सार छंद 

मनखे के स्वारथ छोड़े ले,धरा सरग बन जाही। 
जइसन सुख वो सोंचे नइ हे, तइसन तक सब पाही। 

धरती पहिली सरग रहिस हे,रहिस देव के डेरा।  
सरग परी मन घूमे आवय,जावय करके फेरा। 

निरमल पावन जलधारा हर,कलकल गीत सुनावय। 
चिरई चिरगुन पेड़ जनावर,सबके मन ला भावय। 

नदिया के ये पानी जम्मो,आज प्रदूषित होगे। 
मनखे के करनी ला देखव,सबो जीव हर भोगे। 

स्वच्छ हवा तनमन ला मोहय,जीव जगत हरसावय। 
जंगल झाड़ी बाग बगीचा,झूम झूम लहरावय। 

आज पेड़ हर सबो कटागे, धुँआ गगन भर छागे। 
मनखे के स्वारथ के सेती, अइसन दिन हर आगे। 

माटी ले सोना उपजावन,आज रेत कस होगे। 
बिना जहर अब कुछ नइ होवय,करनी मनखे भोगे। 

पहिली जइसे दिन लायेबर, पेंड़ लगावव भाई। 
जिनगी खातिर स्वारथ छोड़व,पाटव जिनगी खाई।

रचना-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

चौपाई

    ठेकला 

बचपन के सुरता जब आथे। आँखी ले आँसू झर जाथे। 
कतका सुग्घर दिन वो राहय।बाल देख हीरो सब काहय।

मुड़ मा करिया बाल भराये। पाय हवा दिनभर लहराये। 
जेमन देखय ते मन भावय। चार चाँद मुखड़ा लग जावय। 

लम्बा लम्बा बाल बढ़ाये। बच्चन जइसे कटिंग कराये। 
हीरो जइसे बाल सँवारन। केश सँवारे बर नइ हारन। 

तरिया मा जब जाय नहावन। मुड़ी हला के बाल सुखावन। 
तेल डार चम्पी तक भावय। फिर कंघी सुग्घर सपटावय।

लीख जुआँ कतको छबड़ाये। फिर भी बाल मुड़ी मा छाये। 
जब मुंडा होये बर लागय। मन हर येती तेती भागय। 

कोनो ला मुंडा जब देखन। रसता रेंगत ओला छेंकन। 
टकला मुंडा कह चिड़हावन। मुंडी मार बड़ा सुख पावन। 

धीरे धीरे समय गुजरगे। मुड़ ले चुन्दी जम्मो झरगे। 
अब तो बाल रहे नइ भाई। टकला मुंडा आज कहाई। 

बाल बचाये खातिर कतको। उदिम करे हन कहिथे जतको। 
अंडा लहसुन गोबर थोपे। अब तो शेष बचे हे रोपे। 

मँहगा मँहगा तेल लगा के। देख डरे हन सब अजमाके। 
एक ताग तक नइ जामत हे। बचे हवय उँखरो सामत हे।

सबके संगी इही कहानी। दोष देत हे सबझन पानी। 
पर कारण कोनो नइ जानय। मति अनुसार सबोझन तानय। 

आज ठेकला सबझन होगे। नाई तक कैंची रख सोगे। 
अब का चिंता करना भाई। टकला के हाबय अधिकाई। 

दोहा 

होके देखव ठेकला,खुशी मिले भरपूर। 
लीख जुआँ रूसी सबो, हो जावत हे दूर। 

ऊपर वाला सोंच के,करत हवय सब काम। 
सब ला करके ठेकला, अपन लेगही धाम।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार 19-11-19

रोला छंद

खेल

जीवन का यह खेल,हमे कुछ समझ न आये।
जाने कैसे रंग,आज हमको दिखलाये।
धूप छाँव का मेल,चले नित शाम सवेरे। 
जीवन के दिन चार,उसे भी दुख हैं घेरे। 

खुशियों की रख चाह,सवेरे उठ जाते हैं। 
दिनभर भागम भाग,शाम को घर आते हैं। 
होते थक कर चूर,रात निद्रा में जाती।
ढूंढी खुशियाँ रोज,हाथ पर ये ना आती।

हमने जाना खेल,मौज मस्ती का होता। 
मिलता है आनंद,यहाँ कोई ना रोता। 
पर ये कैसा खेल,जहाँ सारे हैं खोते।
पूछो जिससे हाल, हाल पर सब हैं रोते ।

सुख दुख का यह खेल,हमे क्यों नाच नचाते। 
क्या कोई है और,हाथ जिसके हैं खाते ?
पासा कोई फेंक,हमे है राह चलाता।
जीवन का यह भेद,किसी को समझ न आता।

खेल रहा है और, मोहरा केवल हम हैं। 
फिर भी सुख की आश, बताओ ये क्या कम है। 
जीवन के दिन चार, उसे भी खास बनाओ।  
खेले कोई और,उसी में आनंद पाओ। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार 19-11-2019

सार छंद

सार छंद पढ़ाई

दाई मोला बासी देदे, मँय हर इसकुल जाहूँ। 
दिनभर उँहचे पढ़ लिख के मँय,संझा बेरा आहूँ। 

संगी साथी सबझन चलदिन, मँय पछवाहूँ लागे।  
घण्टी के आवाज सुने ता,लइका मन सब भागे। 

पुस्तक कपड़ा फोकट के हे, कापी दू ठन लेदे। 
सीखे खातिर लिखना पड़थे, कलम एक ठन देदे।  

खेल खिलौना खाना पानी,सब उँहचे मिल जाथे। 
रंग रंग के पुस्तक पढ़ना,मोला अड़बड़ भाथे।

पढ़ लिख के हुसियार बनँव मँय,अबड़े नाम कमाहूँ। 
बड़का होके मास्टर बनहूँ,लइका महूँ पढ़ाहूँ। 

बड़े बड़े अधिकारी पद ला,पढ़ लिख के सब पाथे। 
कतको झन डॉक्टर इंजीनियर,पढ़ लिख के बन जाथे। 

पढ़ लिख के मँय करँव किसानी,तभो बने सब होही। 
खातू माटी समझ डारहूँ,फिर धरती नइ रोही। 

बिना पढ़े अब कुछ नइ होवय,साँच कहत हँव दाई। 
अनपढ़ मन पाछू रह जाथे, होथे बड़ करलाई। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार