घनाक्षरी
ददा ह रिसाय हावे,मुँह ला फुलाय हावे,
दाई तक बोले नही,बड़ा जंजाल हे।
बाई घर आये हावे,झगरा मताये हावे,
बिहा करना ह भाई,होगे जी के काल हे।
बाई कोती बोलबे त,दाई ह रिसाय जाथे,
दाई कोती बोलबे त,बाई लाल लाल हे।
घर के न घाट के हौं, मैं तो पुक लात के हौं
धोबी के कुकुर जस,मोर होय हाल हे।
गरज गरज जब,बदरा बरस जाथे,
तरस तरस जीव,तक हरसाय जी।
मगन मगन मन,छमक छमक छम,
थिरक थिरक कर,नाच के दिखाय जी।
डगर डगर हर,महक महक उठे,
चहक चहक कर,तन बतियाय जी।
खेत खार झूमे लागे,पग पग चूमे लागे,
हवा बउराय चले,खुशी जग छाय जी।
बेटी न बताय हावे,कहाँ ओ भगाये हावे,
जिया घबराय हावे,ददा परेसान हे।
दाई ह बिलख रोवे, दिन रात ओ न सोवे,
हाय हाय करे दाई,बेटी म परान हे ।
काय ये जमाना आये,जेला देख ते भगाये,
मान मरियादा के जी,कहाँ ओला भान हे ।
जात पात ओ न देखे,भला बुरा ना सरेखे,
काम ये कराये बैरी,मया बेईमान हे।
घर सुना सुना लागे,जब ले बेटी भगा गे,
दाई रात रात जागे, जाने कब आय जी।
खेल ओ खिलौना रोवै, कुरिया ह मान खोवै,
खटिया उतान सोवै, कोनो नइ भाय जी।
बात कछु ओ न कहे,संग संग जिन रहे,
सबो हे उदास आज,मुँह ला फुलाय जी।
माना बेटी सगा होथे,बिदा बेरा सबो रोथे,
पर जे भगाय बेटी,सबो खिसियाय जी।
महर-महर घर,अँगना महक उठे,
कहर-कहर खेत,खार ममहाय जी।
कुहुक-कुहुक जब,कोयली कुहुक पारे
तब जान लेवा मौर, अमुवा म छाय जी।
सरर-सरर सर, हवा ह चलन लागे,
हरर-हरर के गा, दिन हर आय जी।
चरर-चरर चर,चर-चर-चर बाजे,
पतझड़ होय रहे, पाना चर्राय जी।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार