Sunday, 18 October 2020

सार छंद

सार छंद पढ़ाई

दाई मोला बासी देदे, मँय हर इसकुल जाहूँ। 
दिनभर उँहचे पढ़ लिख के मँय,संझा बेरा आहूँ। 

संगी साथी सबझन चलदिन, मँय पछवाहूँ लागे।  
घण्टी के आवाज सुने ता,लइका मन सब भागे। 

पुस्तक कपड़ा फोकट के हे, कापी दू ठन लेदे। 
सीखे खातिर लिखना पड़थे, कलम एक ठन देदे।  

खेल खिलौना खाना पानी,सब उँहचे मिल जाथे। 
रंग रंग के पुस्तक पढ़ना,मोला अड़बड़ भाथे।

पढ़ लिख के हुसियार बनँव मँय,अबड़े नाम कमाहूँ। 
बड़का होके मास्टर बनहूँ,लइका महूँ पढ़ाहूँ। 

बड़े बड़े अधिकारी पद ला,पढ़ लिख के सब पाथे। 
कतको झन डॉक्टर इंजीनियर,पढ़ लिख के बन जाथे। 

पढ़ लिख के मँय करँव किसानी,तभो बने सब होही। 
खातू माटी समझ डारहूँ,फिर धरती नइ रोही। 

बिना पढ़े अब कुछ नइ होवय,साँच कहत हँव दाई। 
अनपढ़ मन पाछू रह जाथे, होथे बड़ करलाई। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment