Sunday, 18 October 2020

गजल

गजल 

221 2122 221 2122 

ससुराल गे रहँव जी,बिहना ले मँय ह काली। 
धर हाथ ला भगा गे, सँग मोर ,मोर साली।

कुकरा बनाय देशी,बढ़िया डले मसाला। 
बस नून के कमी ले,पटके बबा ह थाली। 

झिल्ली बनाय काबर,सरकार अब बतादे। 
पानी निकल न पावय,सब जाम होय नाली। 

बरसात के महीना,नइ हे पता घटा के। 
नदिया तको सुखाये, बाँधा परे हे खाली। 

कोनो जगा हे सूखा, हे बाढ़ तक कहूँ गा।
मरना हवय सबो ला,भगवान खेले जाली। 

अबतो दिलीप तोरो, नइ तो हवय ठिकाना। 
रुखुवा सबो कटागे,बाँचे न एक डाली। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

24-7-2019

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